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परिश्रम का सम्मान पर निबंध Essay on Dignity of Labour in Hindi

Here Is We Share Short Info about Labour in Hindi- परिश्रम का सम्मान पर निबंध Essay on Dignity of Labour in Hindi- parishram par Nibandh.For School Students & Kids Class 1,2,3,4,5,6,7,8,9, 10. Yaha 100,200,250,300,400, 500 Words Me Diya Gya Hai.

परिश्रम का सम्मान पर निबंध Essay on Dignity of Labour in Hindi

1. भूमिका:
हमारे भारत की संस्कृति ने परिश्रम को सदैव उच्च महत्व दिया हैं. जीवन का मूल आधार ही कर्म को माना गया हैं. अकर्मण्यता को पृथ्वी के बोझ तरह समझा जाता हैं. परिश्रम अर्थात मेहनत करने से जी चुराने वाला व्यक्ति किसी और का क्या भला करेगा, जब वह स्वयं भी कार्य न करने के लिए बहानेबाजी करता हैं. हमारे देश में यह मान्यता हैं कि परिश्रम ही सफलता की कुंजी हैं.

2. स्वरूप:
परिश्रम का सामान्य तौर पर अर्थ शारीरिक श्रम से ही लिया जाता हैं जबकि मानसिक परिश्रम भी इसका एक अहम पहलू हैं. लम्बे वक्त तक जब हमारा देश पराधीनता के दौर से गुजर रहा था तब अधिकतर लोग परिश्रम को छोड़कर आलस्य और चापलूसी का सहारा लेने लगे. देश भर में ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित हो गई थी कि कोई भी परिश्रम कर खाने की बजाय एक दूसरे के विरुद्ध गुट्बाजी कर छल कपट या लूटमार के जरिये अपने जीवन को जीना एक बड़े समुदाय ने अपना ध्येय बना लिया था, जिसका असर भारतीय समाज पर भी पड़ा.

अठाहरवीं सदी के दौर में समाज के जनजागरण आन्दोलन के चलते हर वर्ग के लोगों ने यह समझ लिया कि आखिर जीवन में स्वतंत्रता का उजाला देखना हैं तो स्वयं पर विश्वास कर तथा परिश्रम के बल पर ही देश को ब्रिटिश सत्ता से आजाद करवाया जा सकता हैं और इसी को अपना मूलमंत्र बनाकर राष्ट्र को नई दिशा दी.

3. महत्त्व:
आधुनिक दौर में कुछ कथित बुद्धिमान लोगों के समूह द्वारा कठिन परिश्रम करने वाले लोगों को हीन समझने की परिपाटी चल पड़ी हैं. अपनी मेहनत के दम पर कृषि, वानिकी, मजदूरी करने वाले लोगों को छोटा समझने की विचारधारा ने हमारे देश में परिश्रम की महत्ता को कम किया हैं.

मेहनतकश लोगों के जीवन को दीन हीन समझने वाले वर्ग की सच्चाई यह हैं कि वह स्वयं अपना गुजारा करने के लिए चापलूसी, मुनाफाखोरी तथा दलाली का काम करते हैं. तथा स्वयं को बड़ा मानते हैं. इन्ही चंद लोगों के विचारों के चलते आज आम आदमी को मेहनत कर कमाता हैं उनके मन में एक कुंठा को इन्ही लोगों ने पनपाया हैं. हमारा देश उतनी तरक्की नहीं कर पाया जितनी करनी चाहिए थी, इसका मुख्य कारण भी ये लोग हैं जो स्वयं परिश्रम करने से भागते हैं तथा परिश्रम करने वालों को उचित सम्मान नहीं देते हैं.

4. उपसंहार:
“कर्म प्रधान विश्व करि राखा”, जो जस करहिं सो तस फल चाखा' हमारे तुलसी बाबा ने रामचरित में लिखा हैं कि कर्म करने वाले को ही फल मिलता हैं, हमारी धार्मिक पुस्तक गीता का सार भी तो कर्म ही हैं. कृष्ण ने कर्म करते रहने का संदेश दिया हैं.

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