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मौलिक अधिकारों पर निबंध | Essay on Fundamental Rights in Hindi

मौलिक अधिकार पर निबंध- हमारे देश में सभी नागरिकों को समान अवसर स्वतंत्रता तथा न्याय दिलाने के लिए संविधान सभा द्वारा कुछ बुनियादी नियम बनाए गए जैसे हम मौलिक अधिकार कहते हैं आज किस आर्टिकल में हम मौलिक अधिकारों के बारे में विस्तार से पढ़ेगे।

मौलिक अधिकारों पर निबंध Essay on Fundamental Rights in Hindi

भारत एक लोकतंत्र देश है हमारे देश का श्रेष्ठ कानून सविधान है। सविधान निर्माण के समय से ही भारतीय नागरिकों को समान अवसर और समानता की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष कानून बनाए गए है.

सभी नागरिक अपने जीवन को सरल तथा कानूनी रूप से जी सकें और अपने अधिकारों को अपने व्यवहारिक जीवन में अपनाकर समानता से और स्वतंत्रता के साथ अपने जीवन को व्यापक कर सके।

हमारे देश का संविधान सभी नागरिकों को एक समान मानता है इसलिए भारतीय संविधान में नागरिकों की स्वतंत्रता तथा सुरक्षा के लिए मौलिक अधिकार शामिल किया गया है। मौलिक अधिकार का अर्थ मानव अधिकार है अर्थात नागरिकों के अधिकार हैं।

मौलिक अधिकार क्या है?

मौलिक अधिकार वे अधिकार होते है.जो लिखित रूप से नागरिको सविंधान द्वारा नागरिको को प्राप्त हो.ये अधिकार दो प्रकार के होते है.व्यक्तिगत तथा राजनैतिक अधिकार आम नागरिक को दोनों अधिकारों की प्राप्ति होती है.

नागरिको को प्राप्त वे अधिकार जिससे एक आम नागरिक स्वतंत्रता और समानता से अपना जीवन व्यापन कर सकें.अधिकारों से ही देश तथा एक आम नागरिक का विकास संभव है.

मौलिक अधिकारों का इतिहास

हमारे सविंधान में काफी लम्बे समय से मांग के कारण अमेरिका के सविंधान से हमारे सविंधान में मौलिक अधिकारों का शामिल किया गया.सयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मौलिक अधिकारों को सार्वजानिक घोषित किया गया था.जिसके बाद भारत ने इन अधिकारों को शामिल किया.

मौलिक अधिकारों की चर्चा बहुत लम्बे समय से चल रही थी.कई बार इस पर सभाए की गई.आख़िरकार देश की संस्कृति वेशभूषा धर्म निरपेक्षता के आधार पर मौलिक अधिकारों को सवैधानिक अधिकारों में शामिल किया.

Fundamental Rights in Hindi

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का विशेष महत्व है। संविधान में नागरिकों के 6 मौलिक अधिकार का उल्लेख किया गया है। संविधान के नागरिकों के लिए 6 मौलिक अधिकार निम्नलिखित हैं।

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतंत्रता का अधिकार
  3. शोषण के खिलाफ अधिकार
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
  5. सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार
  6. संवैधानिक उपाय करने का अधिकार

आज प्रत्येक नागरिक को 6 मौलिक अधिकार प्राप्त है.पहले सम्पति का अधिकार भी एक मौलिक अधिकार का हिस्सा था.पर उसे मौलिक अधिकार से हटा दिया गया.अब ये मौलिक अधिकार प्राप्त है-

समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को समान अवसर देने के लिए समानता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है। इस अधिकार के तहत नागरिकों को समान अवसर प्राप्त है आज भी इन अधिकारों के चलते मानव अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाता है कानून नागरिकों को समानता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।

समानता के अधिकार में राजा हो या रंक नेता हो या गरीब नौकर हो या बेरोजगार सभी के प्रति समान अधिकार लागू किया जाता है। 

समानता के अधिकार कोई भी व्यक्ति अधिकारों का हनन नहीं कर सकता सभी को समान अवसर प्राप्त होते हैं। कानूनी रूप से देश के राष्ट्रपति और एक गरीब किसान को भी समान रूप से देखा जाता है.

देश के सभी नागरिको को शिक्षा से लेकर मजदूरी,नौकरी तथा राजनेता तक सभी जगह पर सभी के साथ एक ही कानून कार्य करता है.और सभी पर एक ही नियम चलता है.किसी को कानून का उलंघन करने की अनुमति नहीं है.

देश के किसी भी कार्य में देश का प्रत्येक नागरिक भाग ले सकता है.सभी नागरिको को अपनी अपनी राय देने का अधिकार होता है.देश की अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक मुद्दों पर भी देश का कोई भी नागरिक अपनी राय या सुझाव दे सकता है.

हमारा देश लोकतंत्र होने पर हमारे देश में हर व्यक्ति व्यस्क होने पर अपनी पसंद के अनुसार मतदान कर सकता है.सभी को मत का एक मूल्य होता है.देश का प्रधानमंत्री तथा गरीब व्यक्ति का मत को सामान माना जाता है.

कोई भी नेता या पार्टी जनता को डराकर मत नहीं ले सकती इस स्थिति में नागरिक को अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है.इसलिए हमारे देश के मतदान को सार्वभौमिक मताधिकार का दर्जा दिया गया है.

हमारे सविंधान में मतदान एक व्यक्ति एक वोट एक मोल की पद्दति है.इसमे सभी नागरिको को एक वोट देने का हक होता है.और सभी के वोट सामान रूप से कार्य करते है.

समानता के अधिकार के तहत नागरिको के प्रति जाति,लिंग,रंग,भेद,धर्म तथा स्थिति से अनुसार भेदभाव नहीं किया जा सकता है.

सभी को सामान अवसर प्राप्त है.सार्वजानिक स्थल जैसे- मंदिर,मस्जिद,विद्यालय,मेला तथा होटल जैसे स्थानों पर आने से नहीं रोका जा सकता है.

हमारे देश में भी इन कानूनों के अनुसार ही सभी कार्यो को किया जाता है.सभी को सामान अवसर प्राप्त है.पर हमारे देश में आरक्षण की व्यवस्था पर बात की जाए तो ये समानता के अधिकार का उलंघन है.

पर आरक्षण की व्यवस्था ऐसे लोगो के लिए कि गई है.जो अन्य लोगो की तुलना में पिछड़े हुए है.और सभी को अपनी योग्यता के अनुसार कार्य दिलाना या जो कार्य करने योग्य हो उन्हें वहीं कार्य देना आरक्षण है.ये कमजोर लोगो के लिए उठाया गया कदम है.

इसकी बेहद जरुरत थी.इसलिए ये गरीबो और पिछड़े वर्ग के लोगो को विशेष अधिकार देता है.पर इन कानूनों से सविंधान भी स्वीकार करता है.इसलिए आरक्षण को समानता के अधिकार का उलंघन नहीं ठहराया जा सकता है.

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)

स्वतंत्रता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है.इस अधिकार के अनुसार सभी नागरिको स्वतंत्रता से जीने,रहने,बोलने की अनुमति दी जाती है.इस अधिकार के तहत प्रत्येक नागरिक हर कार्य स्वतंत्रता के साथ कर सकता है.

स्वतंत्रता का अधिकार में नागरिको को स्वतंत्रता मिलती है.पर इसका अर्थ ये नहीं है.कि नागरिक जो चाहे कार्य कर सकता है.इस नियम के अनुसार नागरिक वो कार्य कर सकता है.जिससे किसी अन्य व्यक्ति समुदाय या समाज के अधिकारों का उलंघन न हो.

इस अधिकार में किसी व्यक्ति या समुदाय के अधिकार का हनन करना,किसी के अधिकारों का प्रयोग करना या हिंसक पैदा करने का अधिकार नहीं होता है.खुद के अधिकार से दूसरो को कोई हानि नहीं होनी चाहिए.

इस अधिकार के तहत देश के किसी भी इलाके में रहने का अधिकार है.किसी भी नौकरी को करने का अधिकार है.

किसी भी सामाजिक या गैरकानूनी मुद्दे पर सवाल उठाने तथा किसी भी सार्वजानिक कार्य पर सवाल उठाने की अनुमति है.

इस अधिकार का प्रयोग नागरिक कई बार कर चुके है.हमारे देश में पिछले साल नए कृषि कानूनों का विरोध करते हुए किसानो ने अनेक आन्दोलन चलाए तथा सरकार से इन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की ये स्वतंत्रता का अधिकार है.

कई बार जब सरकार गैर क़ानूनी कार्य करती है.या किसी कारणवश सरकार का विरोध करने की अनुमति भी नागरिको को इस अधिकार में दी जाती है.

इस अधिकार के तहत व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार अपना व्यवसाय चला सकता है.अपनी इच्छा अनुसार खेती कर सकता है.स्वतंत्रता का अधिकार में नागरिक को एक गुनाह की एक ही सजा दी जाती है.

स्वतंत्रता का अधिकार के तहत किसी भी व्यक्ति को अदालत के फैसले की बैगेर नहीं मारा जा सकता है.चाहे उसने कोई भी अपराध किया हो.व्यक्ति को मौत की सजा चुनाने की अनुमति केवल अदालत को ही होती है.

पर इस मामले में भी अपनी आत्मरक्षा के लिए किसी भी अपराधी को बिना अदालत की अनुमति मारा जा सकता है.पर एक आम नागरिक को अदालत की अनुमति के बिना स्पर्श भी नहीं किया जा सकता है.

शोषण के खिलाफ अधिकार (अनुच्छेद 23 और 24)

भारतीय नागरिकों को स्वतंत्रता समानता तथा सुरक्षा से जीने के लिए अनेक अधिकार प्राप्त हैं पर शोषण के विरुद्ध अधिकार एक ऐसा अधिकार है जिसमें नागरिकों को अपने अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार है

इस अधिकार के तहत नागरिकों को अपने अधिकारों की सुरक्षा का अधिकार होता है इस अधिकार का उद्देश्य पिछड़े वर्ग के लोगों तथा गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के अधिकारों के हनन और उल्लंघन को बचाने के लिए शोषण के विरुद्ध अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है।

बड़े लोग तथा राजघराने के लोगों द्वारा गरीब तथा कमजोर वर्ग के लोगों पर अत्याचार किया जाता है बड़े लोग कमजोर वर्ग के लोगों को डरा धमका कर अवैध कार्यों को अंजाम देते हैं कई बार तो गरीब लोगों को अपनी जमीन तक देनी पड़ती है।

तथा बढ़ती बेरोजगारी के चलते हैं मजदूर लोगों को अपने मालिक के लिए कार्य करना पड़ता है पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उन्हें कार्य करने पर भी रोजगार नहीं देते हैं और उनकी जायदाद को हड़पने का प्रयास करते हैं।

गरीब लोगों को अपने मजदूरी से अपने घर का गुजारा ना कर पाने के कारण वे अपने बच्चों को भी अपने साथ मजदूरी पर ले जाते हैं पर कुछ लोगों द्वारा छोटे बच्चों कठिन श्रम करवाया जाता है उनके बदले में उन्हें फूटी कौड़ी भी नहीं दी जाती है। पर ऐसी स्थिति में कमजोर वर्ग के लोग बेचारे अपने मालिक को अपराधों से रोक नहीं सकते है।

कमजोर वर्ग के लोगों के साथ हो रहे इस अपराध को रोकने के लिए हमारे संविधान में शोषण के विरुद्ध अधिकार को संवैधानिक अधिकार का दर्जा दिया गया है। इस अधिकार की वजह से आज अनेक गरीब और कमजोर वर्ग के लोग मजदूरी कर रहे हैं

और अपना घर चला रहे हैं कई लोग इस अधिकार का प्रयोग कर भी अपने मालिक से पैसे प्राप्त करते हैं। यह अधिकार गरीब और मजदूर लोगों के लिए काफी सहायक है। इस अधिकार की वजह से आज अनेक ग्रामीण लोग शहरों में जाकर मजदूरी करते हैं तथा आमदनी कमाते हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

हम एक धर्मनिरपेक्ष देश में जी रहे हैं हमारे देश में किसी एक धर्म को राष्ट्रीय धर्म की मान्यता नहीं है। भारत में सभी धर्मों को समान रूप से देखा जाता है सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है तथा सभी धर्मों के लोगों के साथ समान रूप से कानून लागू किया जाता है।

प्रत्येक नागरिक को किसी भी इलाके में रहकर अपने धर्म को मानना की अनुमति है कोई भी व्यक्ति हो किसी भी धर्म का हो पर सभी को हमारे देश में स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार है। जातिवाद पंथ भेद जैसे सामाजिक कुप्रथा को रोकने के लिए संविधान में अधिकार को शामिल किया गया है।

हर व्यक्ति को अपने धर्म के प्रचार प्रसार की अनुमति है प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार खानपान रहन-सहन तथा पोशाक का प्रयोग कर सकता है और अपनी जाति के अनुसार किसी भी देवता को मान सकता है। किसी भी व्यक्ति को जोर जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन नहीं करवाया जा सकता है पर जो इच्छा के अनुसार धर्म परिवर्तन भी किया जा सकता है।

इस कानून के अनुसार आप किसी भी अन्य धर्म का अपमान या उनके देवताओं गुरुवा या उनके ग्रंथों का अपमान नहीं कर सकते किसी जाति विशेष ग्रंथ का अपमान दंडनीय है। हमारी समाज में कई ऐसी कुप्रथाए है

जिसके अंतर्गत लोगों को सामाजिक नियमों के नियंत्रण में रखा जाता है जैसे विधवा होने पर सफेद कपड़े को पहनना पुनर्विवाह ना करना आदि अनेक धार्मिक प्रथाएं है जिनके लिए लोगों को जोर जबरदस्ती से पालना करवाई जाती है जो कि एक दंडनीय अपराध है।

किसी भी धर्म जाति विशेष व्यक्ति किसी भी कार्य को कर सकता है जाति या पंथ के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता किसी भी धर्म का व्यक्ति एक मजदूर नौकर राजनेता बनने की योग्यता रखता है।

किसी भी धर्म के लोग या समूह धार्मिक संस्था का संचालन कर सकती है तथा अपनी इच्छा अनुसार या अपने धर्म के अनुसार उसमें कार्य का संचालन कर सकती है। सार्वजनिक स्थल पर किसी भी व्यक्ति को जाति या धर्म विशेष के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है।

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

प्रत्येक नागरिक को अपनी संस्कृति वेशभूषा भाषा को बचाने और उसका प्रचार प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी सार्वजनिक स्थल पर किसी भी व्यक्ति को उसकी संस्कृति या भाषा के आधार पर उसे वंचित नहीं किया जा सकता है।

एक छोटा समुदाय अपनी संस्कृति और भाषा का प्रचार कर सकती है और उसका संरक्षण करने का अधिकार भी प्राप्त है। किसी भी बड़े समुदाय के दबाव में आकर छोटे समुदाय के लोग अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए इस अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं।

किसी भी शहर में रहकर किसी भी भाषा को बोलने का अधिकार प्राप्त है इस अधिकार में संस्कृति और शैक्षिक योग्यता पर जोर दिया गया है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

मौलिक अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार संवैधानिक उपचारों का अधिकार है इस अधिकार को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा की आत्मा कहा है।

इस अधिकार के अनुसार नागरिकों को अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय मैं सहायता लेने की अनुमति है।

कई बार ऐसा होता है जब एक आम नागरिक के अधिकारों का हनन किसी व्यक्ति समुदाय या राजनेताओं द्वारा किया जाता है तो इस परिस्थिति में आम व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय की सहायता प्रदान कर अपने अधिकारों की सुरक्षा पा सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा समानता स्वतंत्रता तथा न्यायिक सुरक्षा नहीं मिल रही है तो वह सर्वोच्च न्यायालय से मांग कर सकता है। किसी भी मौलिक अधिकार को लागू करने या उसे निष्कर्ष करने के बारे में नागरिकों को इस अधिकार के तहत दावा करने की अनुमति है। वास्तव में संवैधानिक उपचारों का अधिकार सभी अधिकारों का उपचार है।

कई लोगों के मन में सवाल बनता है कि क्या राष्ट्रपति हमें अपने मौलिक अधिकारों के हो रहे हनन को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जाने से रोक सकता है?

आपकी जानकारी के लिए बता दें राष्ट्रपति किसी भी नागरिक को सर्वोच्च न्यायालय मैं जाने से नहीं रोक सकता है। यदि रोकने का प्रयास किया गया तो वह कानूनन अपराध है।

इस अधिकार के तहत हमें 5 अधिकार प्राप्त है-

  1. परमादेश
  2. निषेधाज्ञा
  3. उत्प्रेषण रिट
  4. बन्दी प्रत्यक्षीकरण
  5.  प्रतिषेध लेख 


मौलिक अधिकार पर रोक

हमें सविंधान द्वारा 6 मौलिक अधिकार प्राप्त है.जिनकी सहायता से हम अपने जीवन को स्वतन्त्र रूप से सुरक्षित जी सकते है.ये अधिकार हमारी सुविधा के लिए बनाए गए है.पर मौलिक अधिकारों में भी कई स्थितियों पर रोक लगाई गई है.जहाँ पर ये अधिकार भी गैरकानूनी होते है.

मौलिक अधिकार का प्रयोग हम किसी भी कार्य को करने में कर सकते है.पर इ अधिकारों से किसी अन्य व्यक्ति या संस्था के अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए.इन अधिकारों के प्रयोग की कुछ सीमाए निश्चत होती है.जिन सीमओं को तोड़ना अधिकारों का उलंघन है.

धर्म की रक्षा तथा अपनी संस्कृति की रक्षा के अधिकार का आप प्रयोग अपनी संस्कृति या धर्म की रक्षा में कर सकते है.पर आप अपनी रक्षा के बहाने किसी अन्य धर्म की संस्कृति को ठेस नहीं पहुंचा सकते है.किसी भी व्यक्ति के कानूनों की असुविधा न हो.

हमें मौलिक अधिकार में स्वतंत्रत जीने का अधिकार है.इसका प्रयोग आप अपनी रक्षा सुनिश्चित करने के लिए कर सकते है.पर अपनी स्वतंत्रता से आप सार्वजानिक कार्यो को बंद करवाना या दखल डालना या सविंधान के नियमो की अनुसंसा करने की अनुमति नहीं होती है.

स्वतंत्रता का मतलब ये है.कि आप को जीने का अधिकार प्राप्त है.पर इसका अर्थ ये नहीं कि आपकी स्वतंत्रता से आप किसी भी व्यक्ति को असुविधाजनक बना सकते है.ये गैरकानूनी है.अपने-अपने अधिकारों की रक्षा करना हमारा धर्म है.पर दूसरो के अधिकारों का हनन करना हमारा अधिकार नहीं है.

किसी भी सामाजिक मुद्दे को लेकर हमें सभा करने की अनुमति है.पर हम इस सभा में हथियारों का प्रयोग नहीं कर सकते है.बिना हथियार तथा शांतिपूर्ण हमें संघटन बनाने की अनुमति प्राप्त है.पर संघटन बनाकर शोर गुल करना या हथियारों का प्रयोग करना गैरकानूनी है.

भारतीय सविंधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार आपातकाल की स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा किसी भी नागरिक की स्थिति को स्थगित किया जा सकता है.यानि किसी भी जगह से या किसी भी यात्रा से यात्रियों या मजदूरो को रोका जा सकता है.

वैसे नागरिको को सरकार के विरोध में कदम उठाने तथा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायलय में शरण लेने की अनुमति होती है.पर बिना गवाह या सबूत के झूठी अपवाह या झूठे वादे कर सरकार के विरोध में आवाज उठाना क़ानूनी रूप से सरकार के अधिकारो का उलंघन है.

मौलिक अधिकारों की विशेषताएं:

मौलिक अधिकार की अनेक विशेषताए है.जो इसे सबसे श्रेष्ठ मानवीय अधिकार देता है.

  1. मौलिक अधिकार सवैधानिक अधिकार है.इन पर रोक नही लगाई जा सकती है.
  2. कई बार आपतकाल की स्थिति में मौलिक अधिकारों पर रोक लगाई जा सकती है.
  3. कई मौलिक अधिकारों का प्रयोग गैर भारतीय यानि विदेशी भी कर सकते है.
  4. मौलिक अधिकारों को किसी भी स्थिति में भंग नहीं किया जा सकता है.पर परस्थितियों के अनुसार संशोधन संभव है.जैसे सम्पति के अधिकार का संशोधन किया गया.
  5. मौलिक अधिकारों में नागरिको द्वारा कानूनों का हनन करने पर उनके विरोध में भी कानून उपलध है.
  6. कुछ आर्थिक अधिकारों का आश्वासन नहीं दे सकती है.
  7. मौलिक अधिकार हमारी संस्कृति,स्वतंत्रता ,धार्मिक हितो की रक्षा करता है.
  8. मौलिक अधिकारों को सविंधान द्वारा सुरक्षा प्राप्त है.


हमें मौलिक अधिकारों की आवश्यकता क्यों है?
नागरिको की सुरक्षा तथा स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए मौलिक अधिकारों की आवश्यकता पड़ती है.गैर क़ानूनी कार्यो को रोकने के प्रत्येक नागरिक को जिम्मेदारी दी जाती है.पर मौलिक अधिकारों में नागरिको को गैर क़ानूनी कार्यो का विरोध करने के अधिकार प्राप्त है.

इन अधिकारों के आधार पर अधिंकाश फैसले आसानी से किये जा सकते है.जिससे समय की बचत होती है.एक आम नागरिक की स्वतंत्रता,समानता तथा न्याय के लिए मौलिक अधिकार उतरदायी है.


मौलिक अधिकारों का महत्व
हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा का कार्य कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के पास होता है.कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका किसी भी प्रकार से हमारे अधिकारों के हनन का सरंक्षण करती है.

मौलिक अधिकारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है.हमारी सुरक्षा,समानता तथा न्याय के लिए मौलिक अधिकार उत्तरदायी है.मौलिक अधिकारों से हमारा जीवन सरल बन जाता है.मौलिक अधिकार प्राकृतिक अधिकार है.

मौलिक अधिकार जन्मसिद्ध अधिकार है.ये हमारी सुरक्षा,समानता,तथा न्याय दिलाने के लिए कई महत्वपूर्ण है.इसका हमारे जीवन तथा देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है.

मूल अधिकार, मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व | Fundamental Rights, Fundamental Duties and Directive Principles In Hindi: सामान्य ज्ञान के लिए यह लेख विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हैं. यहाँ आपकों भारतीय संविधान में नागरिकों के लिए निर्धारित मूल अधिकार, 11 मूल कर्तव्य तथा राज्य के  नीति निर्देशक तत्वों के बारे में जानकारी के कुछ बिंदु बता रहे हैं.

मूल अधिकार, मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व- मूल अधिकार वे अधिकार है जो व्यक्ति के सर्वागीण विकास के लिए आवश्यक होने के कारण सविधान द्वारा नागरिको को प्रदान किये गए है.

मूल अधिकार का महत्व- प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करना,शासन की स्वेच्छा चारिता पर रोक न्यायिक सुरक्षा लोकतंत्र के आधार स्तम्भ समानता के कारण आदि भारतीय सविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों के सम्बन्ध में कुल 23 अनुच्छेद दिये गए है .

अनुच्छेद 12 से 30 व 32 से 35 तक मूल अधिकारों का उल्लेख है मूल सविधान में 07 मूल अधिकार थे किन्तु 44 वे सविधान संशोधन द्वारा सम्पति का अधिकार इस सूची से हटा दिया गया अब छः मूल अधिकार है -समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुध्दा अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार 

मौलिक अधिकारों पर अत्यधिक प्रतिबंद लगे है, शान्ति काल में भी इन पर प्रतिबन्ध लगाना, व्यवस्थापिका का कानून मानने की बाध्यता, राजनीतिक विरोधियों को दबाने में इनका उपयोग, शोषण के विरुद्ध प्रभावी नहीं, न्यायिक प्रक्रिया की बाधा.

नीति निर्देशक तत्व वे विचार है जिन्हें संविधान निर्माताओं ने भविष्य में बनने वाली सरकारों के समक्ष एक पथ प्रदर्शक के रूप में रखा हैं. संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 31 से 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की परिभाषा व इसके प्रावधानों की व्यवस्था की गई हैं.

नीति निर्देशक तत्वों को चार वर्गों में विभक्त कर अध्ययन किया जाता हैं

  • आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी नीति निर्देशक तत्व
  • सामाजिक हित और शिक्षा सम्बन्धी नीति निर्देशक तत्व
  • पंचायती राज, प्राचीन स्मारकों तथा न्याय सम्बन्धी नीति निर्देशक
  • अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा सम्बन्धी सिद्धांत

नीति निर्देशक तत्वों का महत्व

  • शासन हेतु आचार संहिता
  • लोककल्याणकारी राज्य की रूप रेखा
  • शासन के मूल्यांकन का आधार
  • संविधान की व्याख्या में सहायक
  • सामाजिक आर्थिक परिवर्तन में सहायक

मूल अधिकार, मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व

नीति निर्देशक तत्वों के क्रियान्वयन हेतु सरकार द्वारा विभिन्न कार्य किये जा रहे हैं. जैसे भूमि सुधार, पंचायती राज शासन को सुद्रढ़ करना, पंचवर्षीय योजना, निर्माण, कमजोर वर्ग के कल्याण हेतु योजनाएं, सामाजिक सुरक्षा, बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, न्यायिक व्यवस्था में सुधार, अनिवार्य व निशुल्क शिक्षा का अधिकार, सम्पति के अधिकार व्यवस्था में परिवर्तन समान कार्य हेतु समान वेतन आदि.

संविधान के 42 वें संविधान संशोधन 1976 में चतुर्थ भाग में चतुर्थ क जोड़ा गया हैं. इसमें 11 मूल कर्तव्य की व्यवस्था की गई हैं. लेकिन इनकी पालना के लिए कोई प्रभावी कानून नहीं हैं.

Fundamental Rights, Fundamental Duties and Directive Principles

  • भारत के संविधान के किस भाग में मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया हैं- भाग एक
  • जब किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है तो कितने समय के अंदर निकटतम न्यायधीश के समक्ष प्रस्तुत करना होगा- २४ घंटे
  • नीति निर्देशक तत्व किस देश के संविधान से लिए गये हैं- आयरलैंड
  • नीति निर्देशक तत्व का उल्लेख संविधान के किस भाग में किया गया हैं- चौथे
  • पुरुष व स्त्री सभी को समान रूप से जीविका उपार्जन का अधिकार है किस प्रकार का नीति निर्देशक तत्व हैं- आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी
  • किस संविधान संशोधन द्वारा मूल कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया- 42 वें संविधान संशोधन
  • वर्तमान में भारतीय संविधान में कितने मूल अधिकार हैं-6
  • जब न्यायालय किसी पदाधिकारी को उसके कर्तव्य निर्वहन के लिए आदेश जारी करता है तो इसे कहते हैं - परमादेश 

निष्कर्ष- एक नागरिको के जीवन में कठिनाइयों को दूर करने तथा जीवन में सुविधाओं की प्राप्ति के लिए मौलिक अधिकार काफी महत्वपूर्ण है.मौलिक अधिकार सभी नागरिको को कानून में रहकर एक नेक इन्शान बनने के लिए प्रेरित करता है.हमें अपने अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए.