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प्रेम पर निबंध Essay on love in hindi

प्रेम पर निबंध Essay on love in hindi :

जी हां प्रेम प्यार मोहब्बत स्नेह इश्क लव कई नामों से जाना जाने वाला शब्द प्रेम ढाई अक्षर का होते हुए भी अपने अर्थ को इतना विशिष्ट बनाए हुए हैं कि आज तक बहुत सारे कवियों साहित्यकारों लेखकों ऋषि-मुनियों और अन्य सभी पृथ्वी वासियों ने इसके अर्थ को स्पष्ट करने का भरसक प्रयास किया परंतु प्रेम शब्द का अर्थ एक लाइन या कुछ शब्दों में बताना आज भी उतना ही जटिल है.

जितना मानव के प्रादुर्भाव के समय था इस प्रकार प्रेम को परिभाषित करना आसान नहीं है प्रत्येक व्यक्ति प्रेम की अलग-अलग रूपरेखा बना सकता है प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप अलग-अलग हो सकते हैं उसके प्रति नजरिये भी अलग हो सकते हैं लेकिन प्रेम तो प्रेम ही होता है प्रेम रूपी बीज का अंकुरण उस भावना रूपी उपजाऊ भूमि में होता है.

जहां अपनेपन तथा समर्पण के भाव का समन्वय होता है प्रेम प्रत्येक विकट परिस्थिति में साथ निभाने का उपकरण है प्रेम में जुड़े रहने की भावना प्रबल होती है ना की बिखर जाने की प्रेम आत्मा का पवित्र अभिव्यक्ति है उपज है.

प्रेम के बारे में बहुत सारी धारणाएं बनी हुई है कि प्रेम अंधा होता है देखकर किया जाता है हो जाता है प्रेम पागलपन है प्रेम दीवानापन है प्रेम आकर्षण है प्रेम उजाला है उमंग है प्रेम उत्साह है दिल की सर्जनशीलता है दो दिलों का एक हो जाना है प्रेम मार्गदर्शक है प्रेम एहसास है प्रेम आवारा है प्रेम मनुष्य का स्वभाविक भाव है .

मनुष्य होने का प्रमाण है प्रेम चाहत है प्रेम शक्ति है  मानव की बेजोड़ अभिव्यक्ति है भावनाओं का सार  है बहुत सारी ऐसी ही कई धारणाएं वर्तमान में प्रेम के संबंध में प्रचलित है अगर व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रेम जीवन जीने की कला है प्रेम मानव जीवन की नींव है  प्रेम मानव को मानव बनाने का जरिया है मानव कहने का आधार है यह कहना आश्चर्यजनक नहीं होगा कि प्रेम आप सब की आवश्यकता है शायद प्रेम ही वह शक्ति है जिसने मानव सभ्यता को इतने संघर्षों के बाद आज तक अनवरत जारी रखा है.

प्रेम के कई पहलू हैं जिसमें आध्यात्मिक प्रेम सर्वोच्च स्थिति बनाए हुए हैं प्रेम ही व्यक्ति आशावादी बनाता है जीवन के अंधकार में भविष्य की आशा उसे संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करता है मजबूत बनाता है.

व्यक्ति जन्म से ही प्रेम की चाहत रखता है वह प्रेम की बिना जीना ही नहीं चाहता जैसे ही बच्चे का जन्म होता है वह अपने माता पिता तथा दादा दादी से प्रेम प्राप्त करता है वह उनसे दूर नहीं जाना चाहता जैसे ही बच्चे की उम्र चार-पांच वर्ष हो जाती है उसके बाद अपने भाई बहन का प्यार उसे प्राप्त होता है यहीं से व्यक्ति के संस्कारों में व्यापकता आना प्रारंभ हो जाती है तथा प्रारंभिक मूल्यों के विकास में प्रेम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

उसके बाद व्यक्ति स्कूल तथा कॉलेज में अपने मित्रों के साथ प्यार बांटता है प्राप्त करता है तथा प्यार के प्रति उसकी समझ गहरी होती है उसके बाद व्यक्ति अपने कार्यस्थल तथा पारिवारिक जीवन में भी प्रेम चाहता है कहने का अर्थ है कि प्रेम जीवन पर्यंत चलने वाली एक व्यापक अवधारणा है.

जिसका प्रत्येक व्यक्ति के साथ गहरा संबंध है प्रेम का वर्णन इतना अधिक होने के बाद भी प्रेम असीम है वास्तव में प्रेम को अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता प्रेम को एहसास अथवा महसूस किया जा सकता है समझा नहीं जा सकता इस तरह व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक मुहाने पर प्रेम अभिन्न अंग रहता है माता-पिता से लेकर अपनी संतान तक व्यक्ति प्रेम की चाहत रखता है.

प्रेम किसी व्यक्ति को उसके सभी गुणों  को सहर्ष स्वीकार्यता  की भावना है जहां प्रेम है वहां समर्पण की भावना है और प्रेम तथा समर्पण मिलकर भक्ति का रूप धारण कर लेते हैं प्रेम निस्वार्थ भाव से परिपूर्ण होता है इसलिए संकुचित दृष्टिकोण वाले लोग इसे अंधा भी कहते हैं.

आइए बात करते हैं वर्तमान युवाओं के संकुचित दृष्टिकोण से प्रेम को निहारने से इसके अर्थ को समेट कर छोटा कर दिया है प्रेम को आवश्यकताओं तक सीमित कर दिया है कहां जा सकता है कि केवल आकर्षण को प्रेम कहना गलत होगा क्योंकि आकर्षण और प्रेम दोनों ही अलग अलग है दोनों के मध्य अंतर देखा जाए तो आकर्षण परिस्थितियों तथा स्थान के अनुसार बदल सकता है परंतु प्रेम में ऐसा नहीं होता.

युवाओं के मध्य वर्तमान में एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या पढ़ाई और प्रेम दोनों एक साथ संभव है इनका एक दूसरे पर कितना प्रभाव पड़ता है और यह किस प्रकार किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा का निर्धारण कर सकता है काफी मजेदार बात है कि प्रत्येक व्यक्ति प्रेम को अलग-अलग नजरिए से देखता है.

और उसके संदर्भ में प्रेम की परिभाषाएं तक बदल जाती हैं पढ़ाई और प्रेम दोनों एक दूसरे के पूरक है अथवा एक दूसरे के विपरीत हैं या दोनों का एक दूसरे से कोई लेना-देना है या नहीं कहना काफी जटिल है क्योंकि यह निर्भर करता है व्यक्ति की प्रकृति पर उसकी चाहत पर तथा उसके विचारों पर उसके नजरिए पर.

हमारे आसपास कई सारे उदाहरण देखें जा सकते हैं जिसमें कोई व्यक्ति कहता है कि मुझे प्रेम ने आबाद कर दिया तो कोई कहता है बर्बाद कर दिया जरा सोचिए यह क्यों होता है प्रेम क्या वाकई में किसी व्यक्ति को बर्बाद या आबाद करने में सक्षम है तो हां कहा जा सकता है कि सक्षम तो है परंतु यह सब प्रेम नहीं करता यह सब निर्भर करता है प्रेम करने वाले व्यक्ति के दृष्टिकोण पर अगर कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के किसी से प्रेम करता है तो बेशक प्रेम उसे कभी धोखा नहीं देना नहीं उसे कभी बर्बाद करेगा और अगर व्यक्ति स्वार्थ पूर्ति के लिए प्रेम का दिखावा करें या फिर आकर्षण को प्रेम का नाम दें तो बर्बादी की ओर भी जा सकता है.

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