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कृषि विधेयक 2020 पर निबंध हिंदी में | Essay On Agriculture Bill 2020 In Hindi

 कृषि विधेयक 2020 पर निबंध हिंदी में | Essay On Agriculture Bill 2020 In Hindi

पिछले कई महीनों से दिल्ली एवं पंजाब हरियाणा में कृषि कानून को लेकर आन्दोलन चल रहे हैं महीनों से किसान सड़कों पर हैं. विपक्षी दलों द्वारा नयें एग्रीकल्चर एक्ट को काले कानून तक बता दिया हैं. खालिस्तान मूवमेंट के लोगों ने भी किसानों की आड़ में भारत की अखंडता एवं एकता को तोड़ने के हर अवसर को भुनाने का प्रयास किया हैं.


भारतीय संसद द्वारा जून 2020 में 3 कृषि कानून पटल पर लाए गये थे जिन्हें सदनों में बहस के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही कानून का रूप दे दिया गया. किसानों की आय दुगुनी करने एवं उनकी दशा को सुधारने के उद्देश्य से लाए गये इन कानूनों का विरोध केवल देश के एक दो राज्यों में हैं, जबकि देश के दूसरें भागों में किसानों द्वारा इसका समर्थन किया जा रहा हैं.


दरअसल सरकार ने 3 कृषि बिल एक साथ पारित किये हैं, जिनमें पहला हैं कृषि उत्पादन व्यापार एवं वाणिज्य एक्ट 2020. इस कानून के जरिये केंद्र सरकार देशभर के किसानों को अपनी उपज को एम्एसपी मंडी के बाहर कही भी बेचने की स्वतन्त्रता देती हैं. साथ ही सरकार ने APMC मंडी क्षेत्र को राज्य सरकार द्वारा लगाए गये विभिन्न टैक्स से फ्री भी घोषित कर दिया हैं.


इस कानून के एक तथ्य को आधार बनाकर किसानों के बीच सबसे अधिक भ्रामक प्रचार किया गया. किसानों को भ्रमित करने के लिए यह अपवाह फैलाई गई कि सरकार किसानों के लिए MSP अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को ध्वस्त कर रही हैं. जबकि सरकार का यह तर्क हैं कि एमएसपी को समाप्त नहीं कर रहे हैं, बल्कि किसानों को MSP से अधिक कीमत पर धान बेचने के लिए सभी बाध्यताओं को खत्म कर रहे हैं. सरकार द्वारा एक वितीय वर्ष में दो बार एमएसपी की घोषणा की जाती हैं. उस न्यूनतम मूल्य से किसानों को बाजार के मूल्य की उतार चढाव से सुरक्षा मिलती हैं.


इन कृषि कानूनों में दूसरा कानून हैं आवश्यक वस्तु अधिनियम एक्ट 1955, सरकार ने इनसे संशोधित कानून 2020 के रूप में प्रस्तुत कर आवश्यक वस्तुएं यथा खाद्य तेल, दाल आलू प्याज व अनाज को इस सूची से बाहर किया हैं. कानून की मदद से अब किसान अमरजेंसी के हालातों को छोडकर इन उत्पादों का भंडारण कर सकेगे. तथा उचित कीमत मिलने पर ही उनकी बिक्री कर सकते हैं.


हमारे देश में कालाबाजरी और जमाखोरी की भयंकर समस्या हैं. इसमें आज तक बड़े व्यापारी ही खिलाड़ी थे, जो किसानों अथवा छोटे व्यापारियों से आवश्यक जरूरतों की वस्तुओ को कम दाम में खरीद कर जमा कर लेते थे, जब बाजार में उन वस्तुओं की कमी हो जाती और दाम बढ़ जाते तब वे उन्हें बाजार में बेचते थे. इस कारण चीजों के मूल्य निर्धारण में इनका बड़ा हाथ था. इस खेती कानून से अब किसानों को अपनी उपज स्टोक करने का हक मिल गया हैं. 


मोदी सरकार नयें कृषि कानून के रूप में तीसरा बिल मूल्य आश्वासन पर (बंदोबस्त व सुरक्षा) समझौता व कृषि सेवा अधिनियम 2020 लेकर आई. इस कानून में कांट्रेक्ट फार्मिंग अथवा अनुबंध कृषि को बढ़ावा दिया गया हैं. इस कानून को लेकर भी बड़े स्तर पर किसानों को यह कहकर भ्रमित किया गया कि उद्योगपति वर्ग उनकी जमीन पर कब्जा कर लेगे. पंजाब में जिओ के टावर और संस्थानों में तोड़फोड़ इसी अपवाह का कारण था, जबकि असलियत में देश में कांट्रेक्ट फार्मिंग पहले से ही होती आई हैं, और इसमें अनुबंध जमीन का न होकर ऊपज का होता हैं.


इस अनुबंध कृषि में खरीददार और किसान के बीच फसल बुवाई के समय ही एक समझौता हो जाता हैं, कृषि की लागत का वहन कौन करेगा, उत्पाद का मूल्य क्या रहेगा दोनों पक्षों को इससे क्या क्या लाभ होगा. फसल की बिक्री और दाम का आश्वासन किसान को बुवाई पर ही मिल जाता तथा व्यापारी को माल की आपूर्ति का भरोसा मिल जाता था. इससे दोनों पक्षों को लाभ मिलता था. पंजाब में इस कानून के तहत पहले यदि किसान इस कांट्रेक्ट से हट जाता तो पर उन अपराधिक धाराओं का प्रावधान था, जबकि इस कानून में किसानों को कभी भी कांट्रेक्ट रद्द करने का अधिकार दिया गया हैं.


किसानों के आन्दोलन और विपक्षी पार्टियों की अब एक ही मांग हैं, वो है यह तीनों कानून वापिस लिए जाए जबकि सरकार यह मांग स्वीकार नहीं करेगी. देश के अधिकतर किसानों का हित इन कृषि सुधार कानून से होने वाला हैं वही आन्दोलनकारी यह भी नहीं बता पा रहे है कि इन कानूनों में काला क्या हैं, किन बिन्दुओं में सुधार की जरूरत हैं. ऊपरी तौर पर देखने से यही लगता हैं कि दोनों पक्ष अपनी अपनी जिद्द पर कायम हैं नुक्सान आम जनता को हो रहा हैं.


शुरुआत से लेकर आज तक एमएसपी चर्चा का विषय रही, किसानों द्वारा अब यह मांग तेज की गई कि सरकार एमएसपी कानून लाए. इसका मतलब यह हैं कि माना किसी किसान के 100 किवंटल की पैदावार हुई. सरकार ने उसके 20 किव्टल की खरीद एमएसपी के तहत 2000 रूपये प्रति किंवटल की. अब किसान की मांग यह है कि शेष 80 किव्टल धान को चाहे तो निजी व्यापारी खरीदे या सरकार पर मूल्य एमएसपी (उदाहरण के लिए 2000 रूपये) पर ही खरीदे.


यहाँ दो तीन बाते गौर करने योग्य हैं. एक तरफ किसान की मांग भी जायज हैं. परन्तु वास्तविकता में यह कठिन हैं. नया कृषि कानून अमुक किसान को 80 किव्टल धान बेचने के दो नयें विकल्प देता हैं. एक तो वह देश के किसी भी राज्य में जहाँ अच्छी कीमत मिल रही हो वहां जाकर बेचे, दूसरा वह उसका भंडारण कर सकता हैं. जब स्थानीय बाजार में उसे अच्छी कीमत मिल रही हो उसे बेच सकता हैं.


यदि सरकार MSP पर कानून बना देती हैं. तो कृषि उत्पाद व्यापार पूरी तरह अस्त व्यस्त हो जाएगा. व्यापारी उस कीमत से कम कीमत पर धान खरीदेगे जो बाजार मूल्य हैं. यदि बाजार में गेंहूँ का मूल्य 1800 रूपये हैं तो वह क्यों 200 रूपये प्रति किंवटल का खाटा खाकर खरीद करेगा. यदि उसे इस व्यापार में बना रहना है तो या तो विदेश से कम कीमत पर धान खरीदेगा अथवा उसे किसी अन्य व्यापार में जाना होगा. इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा. यदि उनकी उपज को सरकार के सिवाय कोई और खरीददार नहीं मिलेगा तो सम्भव हैं वह उतना न तो भंडारण कर पाएगा न उनकी आमदनी बढ़ेगी. 


सरकार और किसान दोनों पक्षों को चाहिए कि वे अपनी जिद्द का त्याग करें तथा कृषि बिल पर खुले मन से विचार कर जहाँ वाकई सुधार की आवश्यकता हो वहां सुधार करें तथा किसानों के हितों की रक्षा करें. हमारा देश हमारे किसानों की तरक्की और खुशहाली से ही आगे बढ़ पाएगा. यदि वे इस तरह सड़कों पर बैठे रहे तो यह भारत के भविष्य के लिए किसी तरह से अच्छा संकेत नहीं हैं.


उम्मीद करता हूँ दोस्तों कृषि विधेयक 2020 पर निबंध हिंदी में Essay On Agriculture Bill 2020 In Hindi का यह लेख आपकों पसंद आया होगा. यदि आपकों कृषि कानून के बारे में निबंध स्पीच पैराग्राफ अनुच्छेद भाषण में दी गई जानकारी अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें.