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बौद्ध धर्म पर निबंध Essay on Buddhism in Hindi

 बौद्ध धर्म पर निबंध Essay on Buddhism in Hindi

चार सत्य और अष्टकोणीय मार्ग पर आधारित संसार के सबसे बड़े धर्मों में से एक बौद्ध धर्म का उदय  छठवीं शताब्दी पूर्व भारत से हुआ था. हिन्दू धर्म के बाद सबसे प्राचीन धर्मों में बौद्ध धर्म की गिनती की जाती हैं. इसके संस्थापक गौतम बुद्ध थे, इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था तथा ये महावीर स्वामी के समकालीन थे, जिन्होंने जैन धर्म की स्थापना की थी.


धार्मिक जनसंख्या के आधार पर बौद्ध विश्व का तीसरा बड़ा धर्म हैं. इसे मानने वाले अनुयायी भारत, भूटान नेपाल , कम्बोडिया, श्रीलंका, चीन, थाईलैंड और कोरिया में हैं. महात्मा बुद्ध द्वारा प्रवर्तित होने के कारण इस धर्म का नाम भी बौद्ध पड़ा. बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था, वर्तमान में यह नेपाल में स्थित हैं.


बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन तथा माता का नाम मायादेवी था. जन्म के कुछ समय बाद ही मायादेवी की मृत्यु हो गई थी. जिसके चलते बुद्ध का लालन पोषण माता गौमती ने किया था. किवदन्ती के अनुसार ऐसा माना जाता है जब मायादेवी की कोख से भगवान बुद्ध का जन्म होने वाला था, उसी समय उन्हें एक स्वप्न आता है जिसमें एक हाथी उनके चरणों में श्वेत कमल अर्पित करता हैं. स्वप्न के कारण मायादेवी को कुछ समझ नहीं आता है तथा वह उस स्वप्न के रहस्य को किसी ज्योतिषी से पूछती है तब वे कहते है आपकी कोख से जन्म लेने वाला बालक बहुत असाधारण है या तो वह विश्व पर शासन करेगा अथवा विश्व को धर्म का ज्ञान देगा.


चूँकि इनका जन्म एक राजपरिवार में हुआ था, इस कारण एशो आराम की कोई कमी नहीं थी. राज्य था शक्ति थी वैभव और आराम था. शुद्धोदन ने बालक सिद्धार्थ के लिए तीन महल उपहार में दिए जिसमें तीन सुंदर तालाब थे जिनमें अलग अलग भांति के कमल खिलते थे. बाहरी जीवन और उसके सुख दुःख से पूरी तरह अनभिज्ञ थे. जब सिद्धार्थ की आयु 16 वर्ष की हुई तो इनका विवाह यशोधरा के साथ सम्पन्न हुआ. कुछ वर्ष बाद इन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिनका नाम राहुल था. बुद्ध का वैवाहिक जीवन आगाध प्रेम में मशगुल था.


एक दिन महात्मा बुद्ध अपने सारथि के साथ नगरी भ्रमण के लिए निकले. रास्ते में उन्हें चार दृश्य दिखे जो पूरी तरह अलग थे पहला दृश्य दर्द से कराहते एक वृद्ध का था. दूसरा एक बीमार व्यक्ति का, तीसरा एक शवयात्रा का और चौथा, दृश्य एक योगी का था. बुद्ध के लिए ये सब कुछ देखना बिलकुल नया था. उन्होंने सारथि से पूछा ये सब क्या हैं. उसका उत्तर था राजकुमार यह जीवन की सच्चाई हैं. बस इसी घटना ने राजकुमार सिद्धार्थ के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन कर दिया और वे अंतर्द्वंद्व में फंस गये.


मैं कौन हूँ, जीवन क्या है इसकी सच्चाई क्या हैं. दुखों का कारण क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए उन्होंने 29 वर्ष की आयु में ही घर का त्याग कर दिया तथा वन में चले गये. सांसारिक मोह माया का त्याग कर सत्य की खोज में बुद्ध आलारकलाम के पास पहुंचे, इनसे सांख्य दर्शन की शिक्षा ली और निरंजना नदी के तट पर पीपल के वृक्ष के नीचे 6 वर्षों तक कठोर तपस्या की. इसी वृक्ष के नीचे उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ और यह स्थान बोधगया नाम से जाना गया.

 

गौतम बुद्ध ने पहला उपदेश सारनाथ में दिया, बौद्ध धर्म ग्रंथों में इसे धर्मचक्र परिवर्तन के रूप में जाना गया. उनके सबसे अधिक उपदेश श्रीवस्ति में ही दिए गये. कई सारे समकालीन शासक इनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए और बौद्ध धर्म को अपनाया जिनमें बिम्बसार, प्रसेनजित, उदयन और सम्राट अशोक का नाम प्रमुख हैं. गौतम बुद्ध 80 वर्ष की उम्र में 483 ई॰ पू॰ में कुशीनगर नामक स्थान पर विष युक्त भोजन खाने से मृत्यु हो गई इस घटना को महानिर्वाण के रूप में जाना जाता हैं.


महानिर्वाण के बाद बुद्ध के शरीर के आठ अलग अलग अंगों को लेकर आठ बौद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया गया था. बौद्ध धर्म के अनुयायी दो प्रकार से हो सकते है. पहले भिक्षुक जो गृहस्थ जीवन का त्याग कर तपस्या करते है दूसरे उपासक जो गृहस्थ होते हुए बुद्ध की शिक्षाओं पर चलते हैं. बौद्ध धर्म में तीन रत्न (त्रिरत्न), चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग की व्यवस्था है जो संसारिक दुखों से मुक्त होने का एकमात्र तरीका हैं.


बौद्ध धर्म सत्य, अहिंसा और आंतरिक शोधन की बात करता हैं. मनुष्य अपने खुद को जाने और ध्यान करें तभी वह सत्य जान सकता हैं. इतिहास के दो बड़े नाम सम्राट अशोक और भीमराव अम्बेडकर इन्होने जीवन के अंतिम समय में हिंदुत्व से बौद्ध बने. साथ ही दोनों ने लाखों लोगों को इस धर्म को अपनाने के लिए भी प्रेरित किया था.


बौद्ध धर्म अनुयायियों के लिए बुद्ध पूर्णिमा एक बड़ा त्यौहार हैं. इस दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती हैं. हिन्दू कलैंडर के अनुसार यह वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन होती हैं. ऐसा कहा जाता हैं कि भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महानिर्वाण ये तीनों घटनाएं वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुई थी. इस कारण इस दिन महत्व और अधिक बढ़ जाता हैं. हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार है इस कारण हिन्दुओं द्वारा भी बड़े सम्मान के साथ महात्मा बुद्ध को याद किया जाता हैं.


बुद्ध सच्चे समाज सुधारक और अपनी खुली आँखों से वास्तविकता को स्वीकार करने वाले महापुरुष थे. उनके दौर में आत्मा और जीवात्मा के प्रसंग पर भयंकर वाद विवाद था, मगर उन्होंने अस्तित्वहीन विषयों पर समय व्यय करने की बजाय सांसारिक समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया. उन्होंने संसार के दुःख का कारण बताते हुए कहा हमारी लालसा/ इच्छा ही दुखों का मूल कारण हैं. यदि लालसा पर विजय पा सके तो जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती हैं. बुद्ध ने मोक्ष को ही मानव जीवन का अंतिम और सर्वोपरि लक्ष्य माना.


बौद्ध धर्म आत्मा और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता हैं. यह ईसा पूर्व के कालखंड में एक नई बात थी. धर्म में ऐसी बातों को स्थान दिया जिससे सामान्य लोग तेजी से आकर्षित हुए. खासकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती देने के लिए जातीय बंधन ध्वस्त कर सभी को समानता का अवसर दिया, जिसके चलते निम्न वर्ण तेजी से आकर्षित हुए. जातीय भेदभाव को दरकिनार करते हुए बौद्ध संघ के द्वार सभी के लिए खुले थे. स्त्रियों को भी पुरुषों के समकक्ष दर्जा दिया गया. इस लिहाज से बौद्ध धर्म ब्राह्मण धर्म की तुलना अधिक महिलाओं और शुद्र हितैषी था.


सबसे पहले मगध के लोग बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए. वहां के कट्टर ब्राह्मण उन लोगों को निम्न तो मानते ही थे, साथ ही कोई भी ब्राह्मण मगध में मरना तक पसंद नहीं करते थे. बुद्ध ने आमजन की भाषा पालि में उपदेश दिए यह कारण भी अपनी ओर आकर्षित करने में सहायक रहा. बुद्ध का चरित्र एवं सौम्य स्वभाव एक आदर्श था, लोग उन्हें गाली देते तब भी वे चुपचाप सुनते रहते थे.


ईसा पूर्व 500 से पांचवी सदी तक का काल बौद्ध धर्म के लिए स्वर्णकाल था. अशोक द्वारा बौद्ध धर्म अपना लेना एक युगांतकारी घटना थी. मगर बारहवीं सदी आते आते भारत से यह धर्म समाप्त हो गया. इससे पूर्व यह संसार के लगभग सभी भागों में था. अरब तक फैले बौद्ध धर्म के विरोध में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ और बुद्ध परस्ति को हराम कहकर मध्य एशिया को बौद्ध मुक्त कर दिया गया. कालान्तर में धर्म में वे सब विकृतियाँ आ गई जिसके विरोध में इसकी शुरुआत हुई थी.


कर्मकाण्ड दान, मूर्ति पूजा, अनुष्ठान के साथ ही आमजन की भाषा को छोडकर संस्कृत को अपनाना, बड़ी मात्रा में चढावे लेना, बौद्ध विहारों को भारी मात्रा में दान मिलने से विलासी जीवन और कुकर्मों के केंद्र बन गये. जिन कर्मों का गौतम बुद्ध ने प्रतिकार किया वे अब धर्म का हिस्सा बन चुकी थी. स्त्रियों को भोग विलास की वस्तु समझा जाने लगा और विहार दिशा विहीन हो गई. बौद्ध धर्म के पतन का एक बड़ा कारण राज्याश्रय नहीं मिलना भी था. कई शासक पुष्यमित्र शुंग, राजा मिहिरकुल, शशांक भी बौद्ध धर्म को पसंद नहीं करते थे. तुर्की हमलावरों की नजर भी बौद्ध धर्म पर पड़ी, शैव और वैष्णव भी कड़ा विरोध करते थे. ऐसी स्थिति में भारत भूमि से बौद्ध धर्म का पतन शुरू हो गया.


बौद्ध धर्म मानवता, सत्य, अहिंसा और स्वयं अवलोकन और मोक्ष के लक्ष्य को केन्द्रित धर्म हैं. जो हमें मानव के कष्ट में मदद करने के भाव सिखाता हैं. आज भी हमारे देश में लाखों बौद्ध अनुयायी हैं. भारत की संस्कृति और इतिहास में बौद्ध धर्म का बड़ा योगदान हैं. नवबौद्ध आज भगवान बुद्ध की परिपाटी से हटकर हिन्दू विरोध और हिन्दू देवी देवताओं के अपमान को ही अपमानित करना अपना धर्म मानते हैं. ऐसा करके वे भगवान बुद्ध को ही अपमानित करते है वे भी हिन्दू ही थे. 


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