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स्वामी विवेकानंद पर निबंध | Essay on Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद पर निबंध Essay on Swami Vivekananda in Hindi: भारतीय ही नहीं दुनिया  भर  में  स्वामी विवेकानंद का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता हैं. एक युगपुरुष जिन्होंने भारतीयों को भारत वासी होने पर गर्व करना सीखाया तथा समझाया कि क्यों भारतीय संस्कृति दुनियां से बढकर हैं सर्वश्रेष्ठ हैं. स्वामी विवेकानंद के जीवन पर कक्षा 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10 के बच्चों के लिए Swami Vivekananda in Hindi में छोटा बड़ा निबंध यहाँ बता रहे हैं.

स्वामी विवेकानंद पर निबंध | Essay on Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानंद पर निबंध Essay on Swami Vivekananda in Hindi
पूज्य स्वामी विवेकानन्द का प्रारम्भिक जीवन- विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में विश्व नाथ के यहाँ हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था. 1880 में उनकी भेंट रामकृष्ण परमहंस से हुई, जिन्होंने विवेकानंद को ईश्वरीय अनुभूति कराई, विवेकानंद उनके शिष्य बन गये.

विवेकानंद एक धर्म प्रचारक के रूप में

शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेना- 1893 में अमेरिका के शिकागो नामक नगर में एक विश्व धर्म सम्मेलन आयोजित किया गया. स्वामी विवेकानंद ने इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया. उन्होंने इस सम्मेलन में हिन्दू धर्म की विशालता और उदारता पर प्रकाश डाला और हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता स्थापित कर दी.

उन्होंने ओजस्वी वाणी में भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता, सभी धर्मों के प्रति आदर भाव तथा हिन्दू धर्म की विशेषताओं पर प्रवचन देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. 

न्यूयार्क के एक प्रमुख पत्र न्यूयार्क हेराल्ड ने स्वामी विवेकानंद के पांडित्यपूर्ण भाषण की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि विश्व धर्म सम्मेलन में विवेकानंद की दिव्य मूर्ति ही छाई हुई हैं. उनके प्रवचन सुनने के बाद यह अनुभव होता कि भारत जैसे विद्वान् देश में ईसाई पादरियों को भेजना कितनी मुर्खता की बात हैं. इस प्रकार विवेकानंद की ख्याति सम्पूर्ण अमेरिका में फ़ैल गई.

रामकृष्ण मिशन की स्थापना- अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं के प्रचार के लिए स्वामी विवेकानंद ने 5 मई 1897 को कलकत्ता के निकट वेल्लूर नामक स्थान पर रामकृष्ण मिशन की स्थान की. इसका उद्देश्य मानव जाति की सेवा करना हैं.

मिशन ने संसार के अनेक भागों में अपनी शाखाएं स्थापित की हैं, जो उपदेश, शिक्षा, चिकित्सा आदि कार्य करती हैं. तथा अकाल बाढ़, भूकम्प तथा संक्रामक रोगों से पीड़ित लोगों की सहायता करती हैं. 39 वर्ष की अल्पायु में 1902 ई में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई.

स्वामी विवेकानंद के सामाजिक सुधार-
  • जाति प्रथा और छुआछूत का विरोध- स्वामी विवेकानंद प्रगतिशील विचारों के समर्थक थे. उन्होंने जाति प्रथा, छुआछूत तथा ऊँच नीच के भेदभाव का विरोध किया और सामाजिक समानता पर बल दिया. उन्होंने उच्च जाति के लोगों एवं अमीर वर्ग के लोगों द्वारा निम्न जाति के लोगों पर अत्याचार करने तथा उनका शोषण करने की कटु आलोचना की.
  • दलित उद्धार- स्वामी विवेकानंद ने दलित उद्धार पर बल दिया. उन्होंने दीन दुखियों, दलितों आदि के कष्टों को दूर करने तथा उनके जीवन स्तर को उन्नत करने पर बल दिया. उनका कहना था कि दलितों के उत्थान के बिना देश का पुनरुत्थान असम्भव हैं.
  • डॉ रामगोपाल शर्मा ने लिखा है कि दलित उद्धार विवेकानंद के राष्ट्र निर्माण कार्यक्रम का प्रमुख अंग था. स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि अपने पीड़ित देशवासियों के उद्धार के पुनीत कार्य के लिए उन्हें मोक्ष खोकर नरक में जाना स्वीकार हैं.
  • स्त्रियों की दशा सुधारने पर बल देना- स्वामी विवेकानंद ने स्त्रियों की दशा सुधारने पर बल दिया. उनका कहना था कि नारियों की उन्नति के बिना किसी भी देश का उत्थान सम्भव नहीं हैं. उन्होंने बाल विवाह, बहु विवाह आदि का विरोध किया.
  • भारतीय संस्कृति तथा पाश्चात्य संस्कृति में समन्वय पर बल- स्वामी विवेकानंद भारतीयों की उन्नति हेतु भारतीय संस्कृति तथा पाश्चात्य संस्कृति में समन्वय स्थापित करना चाहते थे. उनका कहना था कि भौतिक वाद एवं आध्यात्मवाद में समन्वय स्थापित होना चाहिए.
स्वामी विवेकानंद के धार्मिक सुधार
  • हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता पर बल- स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की श्रेष्ठता पर बल दिया. उन्होंने वेदांत धर्म का प्रचार किया और घोषित किया कि वेदांत की आध्यात्मिकता के बल पर भारत सम्पूर्ण विश्व को जीत सकता हैं. स्वामी विवेकानंद ने भारतवासियों में हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के प्रति आस्था उत्पन्न की.
  • धार्मिक सहिष्णुता तथा उदारता पर बल- स्वामी विवेकानंद ने धार्मिक सहिष्णुता तथा उदारता पर बल दिया. उनका कहना था कि धर्म में दूसरे धर्मों की निंदा, सांप्रदायिकता तथा पारस्परिक विद्वेष को कोई स्थान नहीं होना चाहिए.
  • धर्म अनुभूति है- स्वामी विवेकानंद का कहना था कि धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास हैं. धर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्धांतों में यह केवल अनुभूति में निवास करता हैं. त्याग, सेवा और प्रेम ईश्वर की अनुभूति के लिए आवश्यक हैं. धर्म जीवन का अत्यंत स्वाभाविक तत्व हैं.
  • धार्मिक पाखंडों, रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों का विरोध- स्वामी विवेकानंद ने धार्मिक पाखंडों,रूढ़ियों और अंध विश्वासों का विरोध किया. उन्होंने हिन्दू धर्म में प्रचलित छुआछूत का विरोध किया. उन्होंने हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप पर बल दिया जिसमें जाति प्रथा, छुआछूत, ऊँच नीच के भेदभाव को कोई स्थान नहीं हैं.
  • दीन दुखियों की सेवा पर बल- स्वामी विवेकानंद का कहना था कि दीन दुखियों, दरिद्रों आदि की सेवा करना धर्म का प्रमुख कर्तव्य हैं. निर्धन व कमजोर वर्गों की सहायता में ईश्वर की सच्ची उपासना निहित हैं. उन्होंने दीन दुखियों तथा दरिद्र मानव को ईश्वर का रूप बताया तथा उनके लिए दरिद्रनारायण शब्द का प्रयोग किया.
राष्ट्रीय जागृति में स्वामी विवेकानंद का योगदान

स्वामी विवेकानंद भारत की राष्ट्रीयता के पोषक थे. उन्होंने भारतीयों में आत्मविश्वास की भावना पैदा की, दुर्बलता को पाप बताया और शक्ति पूजा का आह्वान किया. उन्होंने देश के युवकों का आह्वान किया, उठो जागो और तब तक न रूको जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ति न हो. पश्चिम के अंधानुकरण की उन्होंने कटु आलोचना की.

स्वामी विवेकानंद ने देशवासियों से कहा था कि इस बात के ऊपर तुम गर्व करो कि तुम एक भारतीय हो और अभिमान के साथ यह घोषणा करो कि हम भारतीय हैं, प्रत्येक भारतीय हमारा भाई हैं. उन्होंने भारत के अतीत पर गर्व प्रकट किया और उसकी शिक्षाओं द्वारा समस्त भारतीयों को राष्ट्र की सेवा के लिए तैयार रहने का उपदेश दिया.

स्वामी विवेकानंद का मूल्यांकन

स्वामी विवेकानंद 19 वीं सदी के भारत के एक महान सुधारक दार्शनिक एवं धर्मोपदेशक थे. उन्होंने हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की. उन्होंने हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के गौरव से भारतवासियों को अवगत कराया तथा उनमें आत्मविश्वास तथा आत्मसम्मान की भावनाएं उत्पन्न की. उन्होंने देशवासियों में देशभक्ति तथा राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया तथा भारत को एक शक्तिशाली तथा गौरवशाली राष्ट्र बनाने पर बल दिया.

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swami vivekanand ke baare mein nibandh:भारत ब्रिटिश सरकार के अधीन था. उस समय उठो जागो और आगे बढ़े तब तक नहीं रूकों जब तक कि तुम्हें लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, जैसा संदेश देकर भारतीयों को जगाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद ही थे.

इन्होने ज्ञान एवं आध्यात्म का डंका सारी दुनिया में बजाया, आज भारत ही नहीं समूचे संसार में स्वामीजी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता हैं.

स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था. इनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ. इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कि प्रख्यात अटोर्नी थे. इन्होने अपनी शिक्षा अच्छे स्कूल से की, इसके बाद इन्होने कलकत्ता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया. उस कॉलेज में पढ़ने के दौरान उनकी आध्यात्म में रुचि जाग्रत हुई.

और वे ईश्वर विश्व, मानव इत्यादि के रहस्य जान्ने के लिए व्याकुल रहे. विवेकानंद के गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस था. विवेकानंद और परमहंस की पहली मुलाक़ात में प्रश्न किया कि क्या आपने ईश्वर को देखा है परमहंस ने इस सवाल पर मुस्कराते हुए कहा- हाँ मैंने ईश्वर को बिलकुल देखा है जैसे मैं तुम्हे देख रहा हूँ.

परमहंस के इस जवाब को सुनकर स्वामी जी संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उस समय उन्होंने परमहंस को अपना गुरु मान लिया. इस घटना के बाद उन्होंने सन्यासी बनने का निर्णय किया. स्वामी विवेकानंद ने सन्यास ग्रहण करने के बाद एक प्रिवारजक के रूप में पूरे भारत का भ्रमण किया. तभी जब राजस्थान के खेतड़ी में आए तो महाराज ने उन्हें विवेकानंद का नाम दिया.

1893 में संयुक्त राज्य अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ तो खेतड़ी के महाराज ने इन्हें भारत के प्रतिनिधि के तौर पर शिकागो भेजा. 11 सितम्बर 1893 को इस सभा में स्वागत भाषण में स्वामी जी ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा अमेरिका के भाइयों और बहनों वैसा कहते ही तालियों की गद्गदाह्त से सदन गूंज उठा.

विश्व धर्म सभा की यह घटना उस समय की है जब भारत ब्रिटिश सत्ता के अधीन था. विश्व धर्म सभा समाप्त होने के बाद स्वामीजी ने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया और 1897 में भारत लौटे तो भारत वासियों ने उनका शानदार स्वागत किया.

1 मई 1897 ई को कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की. 9 दिसम्बर 1998 में कलकत्ता के निकट हुबली नदी के किनारे बेलूर मठ में स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की. स्वामीजी ने अनेक व्याख्यानों के संग्रह को रामकृष्ण मिशन ने अनेक पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया.

स्वामीजी ने  अनेक पुस्तकों की रचना की जिसमें राजयोग, कर्मयोग, ज्ञान योग एवं भक्ति योग प्रमुख हैं. भारतीय नारियों की दशा सुधारने के लिए उन्होंने अनेक कार्य किये. उनका मानना था कि देश की प्रगति तभी संभव है जब वहां की नारियां शिक्षित हो.

नारियों के महत्व को दर्शाते हुए उन्होंने कन्या पूजन की शुरुआत की. स्वामीजी रामकृष्ण के माध्यम से लोगों की भलाई और सेवा का कार्य करते रहे. 1901-02 में कलकत्ता में प्लेग फ़ैल जाने पर उन्होंने गरीबों की सेवा की. इस कारण अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रख पाए और शरीर कमजोर होता गया.

अन्तः 4 जुलाई 1902 में मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया. इस तरह मानवता के मसीहा ने मानव सेवा के लिए स्वयं की आहुति दी. 1985 में ही स्वामीजी के जन्म दिन 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में हर साल मनाते हैं.

स्वामी विवेकानंद के कार्य निहित उनके आदर्श संस्कार भारतीय युवाओं के लिए विशाल प्रेरणा के स्रोत हैं.
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