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खुला शौच मुक्त गाँव पर निबंध – Khule Me Soch Mukt Gaon Par Essay In Hindi

खुला शौच मुक्त गाँव पर निबंध – Khule Me Soch Mukt Gaon Par Essay In Hindi: कई बार बच्चों को खुले शौच मुक्त भारत (Open defecation free india) पर सरल भाषा में निबंध, भाषण स्पीच अनुच्छेद आदि लिखने को कहाँ जाए तो आप हमारे इस एस्से की मदद ले सकते हैं.

Khule Me Soch Mukt Gaon Par Essay In Hindi

Khule Me Soch Mukt Gaon Par Nibandh Essay In Hindi

निबंध के मुख्य बिंदु
  • प्रस्तावना
  • खुला शौच मुक्त से आशय
  • भारत का पहला खुले में शौच मुक्त जिला
  • सरकारी प्रयास
  • भारत को खुले में शौच से मुक्त करना
  • जन–जागरण
  • हमारा योगदान
  • महत्व/उपसंहार

खुला शौच मुक्त गाँव पर निबंध – Khule Me Soch Mukt Gaon Par Essay In Hindi

प्रस्तावना: शौच मानव की नैसर्गिक आवश्यकताओं में से एक हैं. भारत में प्राचीन काल से ही शौच को लेकर किसी तरह के सामाजिक प्रबंध नहीं थे. गाँव या ढाणियों से दूर जंगलों में लोग निवृत्त होने के लिए जाया करते थे. जैसे जैसे आबादी बढ़ती गई, जंगल खत्म होते चले गये ऐसे में खासकर महिलाओं के लिए खुले में शौच करना मजबूरी सा बन गया, भारत सरकार के प्रयासों द्वारा घर घर शौचालय बनाकर खुला शौच मुक्त भारत बनाने की शुरुआत के बाद अब गाँवों और शहरों में तेजी से खुले में शौच मुक्त गाँवों की संख्या बढ़ रही हैं.

खुला शौच मुक्त से आशय: यदि हम सरल शब्दों में कहे तो गाँवों, शहरों आदि में लोगों द्वारा खेतों, जंगलों या रेल पटरियों पर शौच जाने की बजाय अपने घर में बने शौचालय अथवा सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करना हैं.जब गाँव के सभी लोग इस तरह सदियों पुरानी परम्परा को तोड़ते हुए शौचालय का उपयोग करने लगते हैं तो वह गाँव खुला शौच मुक्त गाँव की श्रेणी में आता हैं.

पुराने जमाने में घने जंगलों अथवा खाली स्थानों की कोई कमी नहीं थी, इस कारण उस समय लोग गाँव से दूर शौच के लिए जाते थे. ऐसे में गाँव की स्वच्छता भी बनी रहती थी तथा मैला ढोने की समस्या भी नहीं होती थी, मल से खाद बनकर भूमि भी उपजाऊ बन जाती थी.

मगर आज की परिस्थतियों में शौच एक सामाजिक मर्यादा का प्रश्न बन गया हैं. गाँव शहरों के पास खाली जगह न होने के कारण खुले में शौच करने से महिलाओं और बच्चियों को न केवल असुरक्षा की स्थितियों से गुजरना पड़ता हैं बल्कि यह बीमारियों और गंदगी का भी बड़ा कारण बन गया हैं. सामाजिक सुरक्षा, स्वच्छता व स्वास्थ्य के लिए घर में बने शौचालय का प्रयोग अति आवश्यक बन गया है. खुले में शौच करने से दस्त, टाइफाइट, पीलिया आदि दुष्प्रभाव देखने को मिलते है.

भारत का पहला खुले में शौच मुक्त जिला: पश्चिम बंगाल का नदिया जिला 30 अप्रैल 2015 को देश का पहला ओडीएफ जिला बना. यूनिसेफ और विश्व बैंक ने भी इसे प्रमाण पत्र जारी किया. 52 लाख की जनसंख्या वाले नदिया जिला में शोबार शौचागर नाम से जिला प्रशासन की मुहीम शुरू की गई तथा शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में मार्च 2015 तक सभी घरों में पक्के शौचालय का निर्माण किया जा चूका हैं. अब तक भारत में कई राज्यों के कई  गाँव खुले में शौच की प्रथा से मुक्त हो चुके हैं. 

खुले में शौच मुक्त गाँव सरकारी प्रयास: किसी भी अभियान या पहल की सफलता समाज की जन भागीदारी पर निर्भर करती हैं. महात्मा गांधी ने स्वच्छ भारत का सपना देखा था मगर आजादी के सात दशक बाद भी न समाज का न सरकार का ध्यान इस तरफ गया. वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी जयंती के अवसर पर बापू के इस सपने को पूर्ण करने का संकल्प किया और घर घर शौचालय बनाने और लोगों को उसके उपयोग करने हेतु स्वच्छ भारत अभियान चलाया.

इससे पूर्व गाँवों की तो छोड़े शहरों की स्थिति बड़ी दयनीय थी. सम्पन्न और धनाढ्य घरों को छोडकर गरीब लोगों के लिए शौच का कोई प्रबंध नहीं था. महिलाओं तथा किशोरियों को शौच जाने के लिए दिन ऊगने से पहले या रात पड़ने का इन्तजार करना पड़ता था, शहर या गाँव के बाहर उन्हें शौच करने जाना पड़ता था, लज्जा और भयं में से निकालने में शौचालय योजना की बड़ी भूमिका रही. 

केंद्र सरकार द्वारा प्रत्येक परिवार को जलयुक्त शौचालय बनाने के लिए आर्थिक सहायता भी दी गई, समाचार पत्रों और मिडिया के अन्य माध्यमों के द्वारा जनजागरण के कार्यक्रम चलाए गये. धीरे धीरे इन प्रयासों से सदियों पुरानी प्रथा को तोडकर अब लोगों ने जीवन में शौचालय के उपयोग को अपनाया हैं.

भारत को खुले में शौच से मुक्त करना: एक ग्राम मल में लाखों विषाणु और बैक्टीरिया होते हैं. स्वच्छता की कमी के चलते देश भर में प्रति वर्ष पांच साल से कम आयु के एक लाख बच्चों की मृत्यु डायरिया से हो जाती हैं. खुले में नित्य शौच से मल सीधे पर्यावरण के सम्पर्क में रहता है तथा इसका बुरा असर बच्चों पर पड़ता हैं. यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 के शुरुआत तक भारत के 36 राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के 706 जिलो एवं 603,175 गांवों को खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया गया है. बहुत कम समय अवधि में यह अभूतपूर्व सफलता हैं. आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 से अब तक करीब 50 करोड़ लोगों ने शौचालय का उपयोग करना शुरू कर दिया है जो पूर्व में खुले में शौच के लिए जाया करते थे. यह स्वच्छ भारत अभियान की एक बड़ी सफलता के रूप में गिना जा सकता हैं. यूनिसेफ भारत सरकार के साथ मिलकर देश के 16 राज्यों के 192 जिलो को ओडीएफ बनाने के मॉडल पर सहायता प्रदान कर रहा हैं. 

खुले में शौच मुक्त भारत बनाने के लिए जन जागरण: जब तक कोई सरकारी स्कीम धरातल पर नहीं उतर पाती है जब तक लोग उससे नहीं जुड़ते, शौचालय और स्वच्छता प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से जुड़ा विषय होने के साथ ही मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों की आवश्यकता से जुड़ा होने के कारण लोगों ने सरकार के इस प्रयास को हाथोहाथ लिया. सरकार ने भी संरचनागत खर्च के अलावा बड़ी रकम नागरिकों को प्रोत्साहित करने के लिए विज्ञापन  आदि पर भी व्यय किया गया.

कई समाज सेवी संस्थाएं और लोगों ने इस योजना को सफल बनाने के लिए सोशल मिडिया और धरातल पर भी अपनी भूमिकाओं को अदा किया. स्कूल के छात्र छात्राओं और शिक्षकों ने भी समाज में खुले में शौच से मुक्त बनाने की दिशा में सराहनीय कार्य किये. किशोरों द्वारा घर में शौचालय होने बावजूद खुले में शौच करने वाले लोगों को देखकर सिटी बजाने काफी चर्चित उपाय रहा.

भारत को खुले में शौच से मुक्त बनाने में हमारा योगदान: एक नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम और पूरा परिवार शौचालय का उपयोग करे तथा अपने गाँव को भी प्रेरित करें. किसी भी बुराई को मिटाने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आने की जरूरत पडती हैं. आम लोगों को शिक्षित किया जाए तथा खुले में शौच करने से होने वाले नुक्सान बीमारियों व गंदगी से परिचय कराया जाए साथ ही शौचालय के उपयोग से लाभ बहन बेटियों की सुरक्षा को सभी समझाया जाए तो निश्चित ही हम व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं.

उपसंहार- समेकित प्रयासों के बाद अब निरंतर खुले में शौच मुक्त गाँवों (odf free india) की संख्या बढ़ रही हैं. समाज में सम्मानित लोगों एवं सरकारी अधिकारियों से लेकर आम जन और छात्रों को भी इस जन आंदोलन का हिस्सा बनना चाहिए. सभी जब अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वहन करेगे तभी भारत खुला शौच मुक्त बनकर बीमारियों को मात दे सकेगा.