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भगवान महावीर पर निबंध | Essay on Lord Mahavir in Hindi

भगवान महावीर पर निबंध | Essay on Lord Mahavir in Hindi: आपका स्वागत करते हैं. आज के आर्टिकल में हम भगवान महावीर के जीवन पर निबंध जानेगे. जैन धर्म की नीव रखने वाले महावीर स्वामी ने हिन्दू धर्म से पृथक एक सम्प्रदाय बनाया, लाखों करोड़ों जैन समुदाय के लोग इन्हें भगवान का दर्जा देते हैं. आज के निबंध में हम महावीर का जीवन परिचय, जीवनी, निबंध, इतिहास, शिक्षाएं कार्य व योगदान को इस शोर्ट एस्से में जानेगे.

Short Essay on Lord Mahavir in Hindi Language

महावीर स्वामी की जीवनी- महावीर स्वामी का जन्म ५९९ ई पूर्व वैशाली के निकट कुंडग्राम में ज्ञातक क्षत्रिय कुल में हुआ था. उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था जो ज्ञात्रक गणराज्य के प्रधान थे. उनकी माता का नाम त्रिशला था.

जो लिच्छवि वंश के राजा चेटक की बहिन थीं. महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्द्धमान था. युवा होने पर वर्द्धमान का विवाह यशोदा नामक राजकुमारी से किया. कालान्तर में उनके एक पुत्री का जन्म हुआ जिसका नाम अणोज्या या प्रियदर्शना था.

अपने माता पिता की मृत्यु के पश्चात वर्द्धमान ने अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया और सन्यास धारण कर लिया.

कैवल्य ज्ञान प्राप्त करना- वर्द्धमान ज्ञान प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगे. इस तपस्या में उन्हें घोर कष्ट उठाने पड़े. उनके कपड़े फट गये और इसके बाद उन्होंने फिर वस्त्र धारण नहीं किये. लोगों ने उन पर नाना प्रकार के अत्याचार किये.

परन्तु उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया. अंत में 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद जम्भीय ग्राम के निकट ऋजु पालिका नदी के तट पर वर्द्धमान को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद वर्द्धमान जिन निग्रंथ और महावीर के नामों से पुकारे जाने लगे.

धर्म प्रचार- ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात महावीर स्वामी ने अपने धर्म का प्रचार करना शुरू कर दिया. वे 30 वर्ष तक मगध, काशी, कोसल, वैशाली आदि प्रदेशों में जैन धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करते रहे. उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होकर अनेक राजा महाराजा, व्यापारी तथा अन्य लोग जैन धर्म के अनुयायी बन गये.

जैन साहित्य से ज्ञात होता है कि मगध के सम्राट बिम्बिसार तथा अजातशत्रु, लिच्छवि वंश के राजा चेटक अवंति प्रद्योत आदि महावीर स्वामी के अनुयायी थे. वैशाली तो उनके धर्म प्रचार का प्रमुख केंद्र था.

निर्वाण प्राप्त करना- अंत में 72 वर्ष की आयु में 527 ई पूर्व में पावापुरी नामक स्थान पर महावीर स्वामी का देहांत हो गया.

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