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बाल विकास का अर्थ, परिभाषा, महत्व, इतिहास और समस्याएं निबंध | child development In Hindi

बाल विकास का इतिहास | child development In Hindi: 17 वीं शताब्दी तक बाल विकास के अध्ययन को विशेष महत्व नहीं दिया हालांकि प्राचीन समय से ही ग्रीक दार्शनिक स्पष्ट कर चुके थे कि बाल्यकाल की घटनाओं बाद में बालक के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. आज हम child development की History को पढ़ने जा रहे हैं. जिसे संक्षिप्त रूप में आपके साथ प्रस्तुत किया गया हैं.

बाल विकास का अर्थ,महत्व, इतिहास और समस्याएं | child development In Hindi

बाल विकास का अर्थ, परिभाषा, महत्व, इतिहास और समस्याएं निबंध | child development In Hindi
Meaning Of Child Development In Hindi | बाल विकास: मानव विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत किया जाता हैं, उसे बाल मनोविज्ञान कहते हैं.

बाल मनोविज्ञान गर्भकालीन अवस्था से परिपक्वास्था तक व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के विकास का वैज्ञानिक अध्ययन हैं.

आधुनिक मनोवैज्ञानिक बाल मनोविज्ञान के स्थान पर बाल विकास (Child Development) शब्द का उपयोग करने लगे हैं. बाल मनोविज्ञान मनोविज्ञान की यह अपेक्षाकृत नवीन शाखा जिसका विकास पिछले 50 वर्षों में सर्वाधिक हुआ हैं.

बाल विकास की परिभाषा (Definition of Child Development)

बाल मनोविज्ञान को भिन्न विद्वानों ने भिन्न प्रकार से परिभाषित किया- क्रो एंड क्रो- बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्भकाल के प्रारम्भ से किशोरावस्था के प्रारम्भिक अवस्था तक करता हैं.

आइजनेक- बाल मनोविज्ञान का सम्बन्ध बालक में प्रक्रिया के विकास से हैं. इसमें गर्भकालीन अवस्था, जन्म, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था और परिक्वावस्था तक के बालक की मनोवैज्ञानिक विकास प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता हैं.

बर्क- बाल विकास मनोविज्ञान की शाखा है जिसमें व्यक्ति की जन्म पूर्व अवस्था से परिपक्वावस्था तक होने वाले सभी परिवर्तनों को स्पष्ट किया जाता हैं.

जेम्स ड्रेवर- बाल मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्व अवस्था तक विकसित हो रहे मानव का अध्ययन किया जाता हैं.

हरलोक- बाल विकास में मुख्यतः बालक के रूप, व्यवहार, रुचियों एवं लक्ष्यों में होने वाले उन विशिष्ट परिवर्तनों की खोज पर बल दिया जाता हैं जो उसके एक विकासात्मक अवस्था से दूसरी विकासात्मक अवस्था में पदार्पण करते समय होता हैं.

इसके साथ ही इसमें यह खोजने का प्रयास किया जाता है कि यह परिवर्तन कब होते हैं, किस कारण और यह वैयक्तिक विभिन्नता है या सार्वभौमिकता.

प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में स्पष्ट किया कि बाल्यावस्था के प्रशिक्षण का प्रभाव बालक के बाद की व्यवसायिक दक्षताओं पर तथा समायोजन पर पड़ता हैं. 17 वीं शताब्दी में जॉन कोमेनियस ने school of infancy की स्थापना की तथा बालकों के लिए दो पुस्तकों की रचना की.

18 वीं शताब्दी में जॉन लॉक, थोमस होब्स जे जे रौस्सेई ने बालकों के अध्ययन पर विशेष बल दिया. पेस्तालोजी महोदय ने 1774 में सर्वप्रथम बाल विकास का विवरण साढ़े तीन वर्षीय पुत्र पर अध्ययन करके प्रस्तुत किया.

यह अध्ययन बेबी बायोग्राफी पर आधारित था. इसी तरह का विवरण 1787 में जर्मनी चिकित्सक टाइडमैंन ने प्रस्तुत किया. 19 वीं शताब्दी में बालक विकास के अध्ययनों में विद्वानों की रूचि बढ़ी.

1889 में तेन ने इन्फेंट चाइल्ड डेवलपमेंट, 1887 में डार्विन ने बायोग्राफीकल स्केच ऑफ एन इन्फेंट तथा 1881 में प्रेपर ने द माइंड ऑफ द चाइल्ड पुस्तकों का प्रकाशन करवाया.

19 वी शताब्दी में ही अमेरिका में बाल अध्ययन आन्दोलन चला जिसके जन्मदाता स्टेनली हॉल थे. स्टेनली हॉल ने चाइल्ड स्टडी सोसायटी तथा चाइल्ड वेलफेयर आर्गेनाइजेशन जैसी संस्थाओं की स्थापना की.

स्टेनली हॉल ने अपने बाल अध्ययनों में प्रश्नावली विधि का उपयोग करते हुए बालकों की अभिवृत्तियों और रुचियों का अध्ययन किया. हॉल ने pedagogical seminary नामक पत्रिका का प्रकाशन करवाया.

1892 में सली महोदय ने ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर चाइल्ड स्टडी की स्थापना की. इस सदी के अंत तक अमेरिका, जर्मनी तथा ब्रिटेन में चाइल्ड स्टडी और padagogist नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ.

तथा इन्हीं देशों के बड़े महानगरों में विशिष्ट व असामान्य बालकों के अध्ययन हेतु मनोवैज्ञानिक उपचारशालाएं स्थापित की. अपराधियों को सुधारने हेतु प्रथम बाल गृह की स्थापना न्यूयार्क में 1887 में की गई.

20 वीं शताब्दी में बाल विकास सम्बन्धी अध्ययन अधिक व्यवस्थित ढंग से किया जाने लगा, इस अवधि में स्टेनली हॉल ने महत्वपूर्ण अध्ययन किये.

इस अवधि में गेसेल ने इन्फेंसी एंड ह्यूमन ग्रोथ तथा गाइडेंस ऑफ मेंटल ग्रोथ नामक पुस्तकों का प्रकाशन करवाया. जीन पियाजे ने लेंग्वेज एंड थॉट ऑफ दी चाइल्ड, चाइल्ड कोंसेप्सन ऑफ द वर्ल्ड एवं मोरल जजमेंट ऑफ चाइल्ड पुस्तकों का प्रकाशन किया.

सन 1930 तक बाल मनोविज्ञान की विषय सामग्री सिमित थी लेकिन पिछले ४० वर्षों में इन अध्ययनों में मानव विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अंतर्निहित प्रक्रियाओं का अध्ययन सम्बन्धी नवीन ट्रेंड चला हैं.

Child Development In India In Hindi | भारत में बाल विकास

भारत में बाल विकास का प्रारम्भ सन 1930 से हुआ. इसमें सर्वाधिक कार्य व्यक्तित्व और मापन के क्षेत्र में हुआ. गर्भकालीन अवस्था एवं नवजात शिशुओं पर अध्ययन का पुर्णतः अभाव हैं. और कम आयु के बच्चों पर भी बहुत ही कम अध्ययन हुए हैं.

अधिकांश अध्ययन 10 वर्ष की आयु से अधिक के ही बालक थे. संवेग के क्षेत्र में बी. नागरथाना, के डी घोष, टी ई सनमुगम, आर वर्मा, हफीज, एच एन मूर्ति, वी के शर्मा आदि का योगदान महत्वपूर्ण हैं. एस कालरा द्वारा न्यूरोटिक बच्चों पर किया गया अध्ययन महत्वपूर्ण हैं.

बालकों की भाषा व शब्द भंडार के क्षेत्र में जी पाल, एम् एम सिन्हा, एम रानी द्वारा महत्वपूर्ण अध्ययन किये गये. एन एस चौहान, के एन शर्मा, डी एन श्रीवास्तव ने वाचिक अधिगम के क्षेत्र में अध्ययन किया वही राममूर्ति व परमेश्वरन ने अधिगम स्थानान्तरण तथा चौहान व शर्मा ने सृजनात्मकता पर अध्ययन किया.

बालकों के व्यक्तित्व से सम्बन्धित समस्याओं पर एच के मिश्रा, पारमेश, ए के मिश्रा, एन के दत्त, पी नटराज, ए एस पटेल, डी एन श्रीवास्तव इत्यादि मनोवैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया. सागर शर्मा, के जी अग्रवाल, डी एन श्रीवास्तव, पी देव इत्यादि मनोवैज्ञानिकों ने बालकों के आत्म प्रत्यय के मापन अथवा निर्माण का अध्ययन किया हैं.

बुद्धिमापन के लिए टंडन, एम सी जोशी, जलोटा, भाटिया इत्यादि मनोवैज्ञानिकों द्वारा कुछ परीक्षण विकसित हुए इसी प्रकार व्यक्तिमापन के लिए समायोजन मापनियों का निर्माण एच. एच अस्थाना, जयप्रकाश, प्रमोद कुमार, सिन्हा व सिंह एवं श्रीवास्तव द्वारा किया गया.

चिंता मापनियों का निर्माण सिन्हा, सिंह, दत्ता, पटेल व श्रीवास्तव द्वारा तथा रूचि मापनियों का निर्माण चटर्जी, सिंह, लाभसिंह, बंसल व श्रीवास्तव द्वारा किया गया.

बाल विकास व विकासात्मक मनोविज्ञान में अंतर- बाल विकास में गर्भावस्था से किशोरावस्था की प्रारम्भिक अवस्था तक की समस्याओं का अध्ययन किया जाता हैं. जबकि विकासात्मक मनोविज्ञान में गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक का अध्ययन किया जाता हैं.

बाल विकास की प्रकृति | Nature of Child Development In Hindi

बाल विकास की प्रकृति मनोविज्ञान में विशिष्ट उपागम के रूप में बाल मनोविज्ञान- मानव व्यवहारों के अध्ययन के लिए बाल मनोविज्ञान विषय में कई उपागमों का प्रयोग किया जाता है जो निम्न हैं.
  • व्यक्तित्व सम्बन्धी उपागम
  • दैहिक उपागम
  • प्रयोगात्मक उपागम
  • विकासात्मक उपागम
मनोविज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में बाल मनोविज्ञान- मनोविज्ञान में मानव व्यवहार का अध्य्यन किया जाता हैं. मानव व्यवहार के कई पक्ष व आयाम होते हैं. इस विभिन्न पक्षों का अध्ययन मनोविज्ञान की विभिन्न शाखाओं में किया जाता हैं.

ऐसी ही एक शाखा बाल मनोविज्ञान हैं. जिसके अंतर्गत गर्भकालीन अवस्था से लेकर युवावस्था तक के विकासशील मानव के व्यवहार का अध्ययन किया जाता हैं.

इसमें विकास से तात्पर्य मानव की जैविक संरचना तथा मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं में होने वाले क्रमिक परिवर्तन हैं.
एक विशिष्ट अध्ययन प्रणाली के रूप में मनोविज्ञान- बाल मनोविज्ञान एवं उसी के विकसित रूप बाल विकास की अपनी विशिष्ट अध्ययन प्रणाली हैं.

इसकी विकासात्मक प्रकृत्ति वाली समस्याओं का अध्ययन अपनी दो प्रणालियों समकालीन अध्ययन प्रणाली व दीर्घकालीन अध्ययन प्रणाली द्वारा किया जाता हैं.

बाल विकास का क्षेत्र एवं समस्याएं (Area Of Child Development In Hindi)

बाल विकास के क्षेत्र के अंतर्गत गर्भधारण अवस्था से युवावस्था तक के सभी मानवीय व्यवहार सम्बन्धी समस्याओं को सम्मिलित किया जाता हैं. एल कारमाइकेल महोदय के अनुसार बाल मनोवैज्ञानिक निम्न सात समस्याओं का अध्ययन बाल मनोविज्ञान के अंतर्गत करते हैं.

बाल विकास का क्षेत्र एवं समस्याएं (Area Of Child Development In Hindi)
  • विकासशील मानव की भौतिक प्रक्रियाएं और गतिशीलता
  • वातावरण का बालक पर प्रभाव
  • बालक का वातावरण पर प्रभाव
  • विकासात्मक प्रक्रियाओं की दीर्घकालीन प्रणाली वर्णन
  • विकासात्मक प्रक्रियाओं का क्रमिक समकालीन वर्णन
  • व्यक्ति का किसी भी आयु सत्र पर मापन
  • व्यक्ति की सम्पूर्ण पृष्टभूमि में उसका आनुवांशिक लेखा जोखा प्राप्त करना
  • बाल विकास की समस्याएं (Child development problems)
  • बाल मनोवैज्ञानिक विषय के क्षेत्र के अंतर्गत अध्ययन की जाने वाली समस्याएं निम्नलिखित हैं.
  • विकासमान मानव की मूलभूत यांत्रिकी और गतिशीलता का अध्ययन- बाल मनोवैज्ञानिक विषय क्षेत्र की इस समस्या के अंतर्गत विभिन्न विकास अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता हैं.
  • जन्म से पूर्व की अवस्था-
गर्भधारण से जन्म तक की अवस्था इस अवस्था के तीन प्रमुख भाग हैं.
  • - गर्भधारण से दो सप्ताह पूर्व तक की अवस्था
  • - दो सप्ताह से चौबीस सप्ताह की अवस्था
  • - चौबीस सप्ताह से जन्म तक
जन्म के पश्चात की अवस्था- इस अवस्था के अंतर्गत मुख्यतः पांच भाग हैं.
  • - शैशवावस्था जन्म से दो सप्ताह तक
  • - बचपन- दो सप्ताह से दो वर्ष
  • - बाल्यावस्था- दो वर्ष से 11-12 वर्ष
  • - पूर्व किशोरावस्था - 12 से 18 वर्ष तक
  • - पश्चात किशोरावस्था- 18 से 21 वर्ष 
जन्म से पूर्व की अवस्था में तीन प्रकार की विकास प्रक्रियाओं शारिरिक, गत्यात्मक तथा सांवेदनिक का अध्ययन किया जाता हैं. जन्म से बाल्यावस्था तक मुख्यतः शारीरिक, मानसिक, सांवेदनिक, संवेगात्मक, सामाजिक, नैतिक, गत्यात्मक और भाषा सम्बन्धी विकास का अध्ययन किया जाता हैं.

बाल्यावस्था के पश्चात किशोरावस्था तक मुख्यतः शारिरिक, सामाजिक, मानसिक, संवेगात्मक, नैतिक विकास प्रक्रियाओं के अध्ययन के साथ ही उनकी विभिन्न समायोजन सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन, व्यक्तित्व विकास सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन तथा उनकी अभिवृत्तियों एवं रुचियों के विकास आदि से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन किया जाता हैं.

वातावरण और बालक- बाल मनोविज्ञान में इस समस्या के अंतर्गत निम्न दो प्रकार की समस्याओं का अध्ययन किया जाता हैं.

बालक का वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता हैं?

वातावरण बालक के व्यवहार, व्यक्तित्व तथा शारीरिक विकास आदि को किस प्रकार प्रभावित करता हैं.
वातावरण में बालक का एक उच्च संगठित उर्जा तंत्र हैं.

इस तरह की समस्याओं में बालक को स्वतंत्र चर तथा बालक के द्वारा उसके स्वयं के लिए निर्मित मनोवैज्ञानिक वातावरण को परतंत्र चर माना जाता हैं. बालक अपने चारों ओर के सामाजिक पर्यावरण को सर्वाधिक प्रभावित करता हैं.

बालकों में अनेक शारीरिक और मानसिक योग्यताएं होती हैं. जिसके द्वारा वह चारो ओर के वातावरण को प्रभावित करता हैं. इस तरह की समस्याओं के अध्ययन में वातावरण सम्बन्धी कारक स्वतंत्र चर होते हैं. तथा बालक का व्यवहार परतंत्र चर होता हैं.

मानसिक प्रक्रियाएं-बाल मनोविज्ञान में बालक की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, चिन्तन, साहचर्य अधिगम तथा कल्पना का अध्ययन निम्न दो समस्याओं के रूप में मुख्यतः किया जाता हैं.

भिन्न भिन्न आयु स्तरों पर बालक की ये विभिन्न मानसिक प्रक्रियाएं किस रूप में पाई जाती हैं इनकी गति क्या है आदि.

इन मानसिक प्रक्रियाओं का विकास किस प्रकार तथा कैसे होता हैं. और इनके विकास को कौन कौनसे कारक प्रभावित करते हैं.

बाल व्यवहार और अन्तः क्रियाएं- बालक और उसके वातावरण में समय समय पर अन्तः क्रियाएं होती रहती हैं. बालक की अन्तः क्रियाएं उसके परिवारजनों के साथ उसके पड़ोसियों के साथ उसके खेल के साथियों के साथ, उसके शिक्षकों के साथ, परिचितों के साथ एवं वह जिन व्यक्तियों के सम्पर्क में आता हैं.

उन सबके साथ वह किसी न किसी प्रकार की अन्तः क्रियाएं की अवश्य करता हैं. बालक की इन विभिन्न अन्तः क्रियाओं में कौन से और क्या क्या क्रमिक परिवर्तन होते हैं. तथा इन परिवर्तनों की गतिशीलता किस प्रकार की हैं. इत्यादि का अध्ययन बाल मनोविज्ञान करता हैं.

बाल विकास विषय की आवश्यकता और महत्व Utility And Importance Of Child Psychology

  • बालकों के स्वभाव को समझने में उपयोगी
  • बालकों के विकास को समझने में उपयोगी
  • बालकों के शिक्षण और शिक्षा में उपयोगी
  • बालकों के व्यक्तित्व विकास को समझने में उपयोगी
  • बालकों के व्यवहार को नियंत्रित करने में उपयोगी
  • बालकों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में उपयोगी
  • बाल व्यवहार के सम्बन्ध में पूर्व कथन करने में सहायक
  • बाल निर्देशन में सहायक
  • सुखी पारिवारिक जीवन बनाने में सहायक
  • असामान्य बालकों की शिक्षा के लिए उपयोगी
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