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महिला सशक्तिकरण पर निबंध Essay On Women Empowerment Hindi

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Essay On Women Empowerment In Hindi- किसी भी राष्ट्र या समाज में महिलाओ की विशेष भूमिका होती है. आज हम महिलाओ के सशक्तिकरण क्या है? इसके महत्व के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे.

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Essay On Women Empowerment Hindi

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Essay On Women Empowerment In Hindi

A good man will make a great civilization,
But a good woman will make a great nation!

उपरोक्त पंक्तियां यह पूर्ण रूप से सिद्ध करती हैं कि नारी के अभाव में एक प्रगतिशील समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

सिर्फ प्रगतिशील समाज की ही नहीं अपितु नारी के अभाव में मानव की कल्पना करना भी असम्भव है। क्योंकि मानव जीवन का आरंभ ही नारी की गोद में होता है।

हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी उपलक्ष्य में आज हम आपके लिए " नारी सशक्तिकरण "विषय पर वैचारिक निबंध लेकर आए हैं।

साथ ही आज हम आपका परिचय ऐसी सशक्त नारियों से कराने जा रहे हैं, जिन्होंने समाज के उत्थान में अपना अतुलनीय योगदान दिया है।

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आधुनिक समय में महिला सशक्तिकरण आवश्यक विषय है. इस पर हमें अम्ल करने की जरुर है. महिलाओ द्वारा खुद के जीवन का निर्णय खुद लेने की आजादी को हम महिला सशक्तिकरण कहते है.

आज की महिलाओ की काफी अधिकार प्राप्त है. जो उन्हें इस समाज में आजादी का जीवन प्रदान कर रही है. पर आज भी इसमे सुधार की जरुरत है.

हमारा देश जब गुलामी की जंजीर में बंधा था. उस समय भी भारतीय लोगो के मन में महिलाओ के प्रति सम्मान और आदर स्वतंत्रता का भाव था. जिस कारण देश के सविंधान में महिलाओ को विशेष अधिकार दिए गए है.

एक समाज के विकास के लिए महिलाओ का जग्राह होता बहुआवश्यक है. क्योकि एक पुरुष की भाँती एक महिला स्वतंत्र होकर वो हर असंभव कर करने की क्षमता रखती है. जो पुरुष नहीं कर पाते है.

आधुनिक महिलाओ को समाज की इन जंजीरों को तोड़कर इस दुनिया को अपना महत्व बताना होगा. आज का पुरुषप्रधान समाज महिलाओ के महत्व से अवागत नहीं है. वे महिलाओ को किसी भी कार्य करने के लिए योग्य नहीं समझते है.

जब तक महिलाए खुद को स्वतन्त्र नहीं करा पाएगी. तब तक महिलाओ को कमजोर ही समझा जाएगा. इसलिए हमें महिलाओ को अधिक से अधिक अवसर प्रदान कर उनकी असली छवि को इस समाज के सामने प्रस्तुत करना होगा.

महिलाओ पर हो रहे अपराधो का प्रमुख कारण दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी है. जो महिलाओ को कमजोर बना रहे है.

भारतीय सविंधान में भी लिंगभेद को गैरकानूनी माना गया है. पर आज के राक्षस लोग महिलाओ के प्रति भेदभावपूर्ण जीवन जी रहे है. तबी तो  आज तक हमारा देश विकसित देशो में सुमार नहीं है.

किसी भी व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक आधार पर हम उसे कमजोर या मजबूत नहीं कह सकते है. पर आज महिलाओ के साथ यही हो रहा है. उनकी मानसिकता के आधार पर उन्हें कमजोर बताया जाता है.

आज के समाज में महिलाओ को बच्चो को जन्मदेना ही उनका कर्म मानते है, पर आज की महिलाए हर कार्य करने में सक्षम है. महिलाओ को अवसर देने पर वे पुरुषो को टक्कर दे रही है.

आजकल महिलाओ को तलाक की समस्या अचानक तेजी से सामने आ रही है. लोग छोटी बड़ी बात पर महिला को तलाक देने के लिए तैयार हो जाते है.

इसलिए भारतीय सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय सविंधान संसोधन 108 के अनुसार महिला 33 प्रतिशत की हिस्सेदार मानी गई है. जो महिलाओ के साथ हो रहे इस अपराध को कम करने में सहायता करेगी.

महिलाओ की स्वतंत्रता तथा उन्हें समान अवसर प्रदान करने के लिए अनेक कदम उठा रही है. इसी पहल में सरकार ने अनेक योजनाए बनाई है. तथा महिलाओ को शिक्षित बनाने और स्वतंत्रत करने के प्रयास कर रही है.

सरकार के प्रयासों और समाज की जागरूकता महिलाओ के शिक्षा स्तर में बढ़ोतरी के कारण आज की शहरी महिलाए तेजी से विकास करती जा रही है. लेकिन आज भी गाँवो में महिलाए पिछड़ी हुई है.

शहरो में महिलाओ की साक्षरता दर बहुत अधिक है. जबकि ग्रामीण इलाको में ये बहुत कम है. यानी आज भी हमें ग्रामीण लोगो को जागरूक बनाना होगा. तथा शहरी महिलाओ को अपने कार्यो से सभी को प्रेरित करना होगा.

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हमारे देश में प्राचीन समय से ही महिलाओ को लाचार और कमजोर समझा जाता है, उनका कार्य मात्र घरेलु काम ही है, जिसमे खाना पकाना, बच्चो और परिवार की देखभाल करना. पर जैसे जैसे आज का समाज जागरूक हो रहा है.

वैसे वैसे भारतीय महिलाओ की स्थिति में सुधार आ रहा है. आज भी समाज पुरुषप्रधान ही है. हर निर्णय पुरुष ही लेते है. महिलाओ के अधिकार और कार्य भी पुरुष ही तय करते है. इसी कारण महिलाओ के जीवन के कैदी का जीवन माना जाता है. जो पुरुष की इच्छा के अनुसार ही कार्य करता है.

अपने हितो के लिए महिलाओ ने संघर्ष शुरू किया है, जिसमे सरकार भी उनका सहयोग कर रही है. महिला सशक्तिकरण महिलाओ के विकास के लिए आवश्यक है. महिलाओ को अपने जीवन के हर निर्णय को लेने की आजादी है.

हमारा देश 200 साल तक अंग्रेजो का गुलाम रहा यह बात सभी जानते है, पर महिलाए कितने सालो से गुलामी की बेडियो में पिछड़ रही है. यह कोई नहीं जानता. कभी दहेज़ के लिए तो कभी सती बनने के लिए और कभी पर्दा प्रथा से इन्हें हमेशा बांधकर रखा गया.

पिछले कुछ समय से देश की महिलाओ में अपनत्व का भाव जगा है, जो अब अपने परिवार और बच्चो के लिए नहीं बल्कि अपनी महिला साथियों के लिए जगा है, जो उन्हें एक स्वतन्त्र और आत्मनिर्भर महिला बनाने में सहयता करेगी.

एक महिला पढ़ लिखकर कई परिवारों को सुधार सकती है. इसलिए महिलाओ का कर्तव्य है, कि वह किसी पर निर्भर न रहकर अपने विकास के लिए कार्य करें. अपनी बच्चियों को बच्चो की तरह ही उचित शिक्षा दिलाए. सभी को बराबर का हक़ दिलाए.

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महिला का शाब्दिक अर्थ है मही यानि " पृथ्वी को हिला देने वाली महिला। यहां पृथ्वी को हिलाने से तात्पर्य पृथ्वी का संतुलन बिगाड़ने से नहीं अपितु वहां मौजूद बुराइयों को उखाड़ फेंकने से है।

इस प्रकार जब जब समाज में बुराई ने विकराल रूप धारण किया है। तब तब उसे नारी की शक्ति का एहसास हुआ है। भारत का प्राचीन इतिहास नारी की वीरता, शौर्य, पराक्रम और बलिदान की प्रेरक कहानियों से भरा पड़ा है। 

इतना ही नहीं वर्तमान समय में भी नारियां समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। नारी की महत्ता स्वीकार करते हुए किसी ने सही कहा है कि.....नारी के अभाव में एक सजा सवंरा घर भी जंगल के समान प्रतीत होता है।

नारी सशक्तिकरण की महत्ता 

हमारे समाज में जितने भी महान् पुरुष हुए। उन सभी ने नारी के महत्व को स्वीकारा है और नारी समाज के विकास के लिए कार्य किया है। लेकिन जिस प्रकार से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।

ठीक उसी प्रकार से आज जहां समाज में आधी आबादी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही है। तो वहीं दूसरी ओर, नारी शोषण अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है।

आज इस उपभोक्तावादी युग में जिस उत्पाद से नारी आकर्षित नहीं लगती है, वह उत्पाद महत्वहीन मान लिया जाता है। इतना ही नहीं अनेक उत्पादों के विज्ञापनों में नारी को या यूं कहे तो उसके देह को प्रमुखता से दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ राह चलते लड़कियों के साथ दुष्कर्म, छेड़छाड़ के मामले आम हो गए हैं। ऐसे में नारी समाज का जागरूक होना समय की मांग बन चुका है। क्योंकि हमारे समाज में प्रारंभ से ही पुरुषों को ऐसे परिभाषित किया गया है जैसे वह वीर, योद्धा,  

तनी हुई मूंछ वाला और मजबूत बाहों वाला हो। तो वहीं नारी से हमारा अभिप्राय सदैव पतिव्रता, सती, साध्वी, अबला आदि से होता है। ऐसे में महिलाओं को यही सिखाया जाता है.

कि वह कोमल ह्रदय वाली, क्षमाशीलता और सौंदर्य का गुण धारण करती है। जिसके चलते यदि कोई महिला किसी पुरुष के बराबर योग्यता या प्रतिभा का परिचय देती है.

तो अक्सर पुरुष उसे अपने  स्वामित्व और स्वाभिमान पर अतिक्रमण समझते है और महिलाओं को खुद से ऊपर बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। ऐसे में आज नारी का  सशक्त होना बहुत जरूरी है तभी मानव जीवन का कल्याण संभव है।

जब बात नारी सशक्तिकरण की आती है, तब हमारे समाज की उन नारियों का जिक्र किया जाता है। जिन्होंने अपने अदम्य साहस से सम्पूर्ण विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

प्राचीन समय की बात करें तो भारतीय समाज में गार्गी, विदुषी, मैत्रेयी, मीरा बाई आदि ऐसी नारियां हुई। जिन्हें ना केवल अस्त्र विद्या बल्कि शास्त्र विद्या का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त था।

मध्य भारत में रानी लक्ष्मी बाई, कित्तूर चेन्नम्मा, विजय लक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी, सावित्रीबाई फुले आदि नारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ व समाज में पहले पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ मोर्चा संभाला।

इसके अलावा आधुनिक समय में इंदिरा गांधी, लक्ष्मी सहगल, सरोजिनी नायडू,  मदर टेरेसा, कल्पना चावला,  फातिमा बीबी, बछेंद्री पाल, एनी बेसेंट, किरण बेदी आदि अनगिनत महिलाओं ने अपने अपने क्षेत्र में महारथ हासिल की है।

ऐसे में आवश्यक है कि समाज में महिलाओं की संख्या अधिक हो, क्योंकि यह सत्य है कि बहुसंख्यक लोगों के प्रति ही समाज का नजरिया नरम और सम्मानजनक होता है।

नारी सशक्तिकरण से जुड़े कानून और अधिकार

महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक आज़ादी देने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में महिलाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानून पारित किए गए हैं,

जो महिलाओं को पूर्ण अधिकार प्रदान करते हैं। जैसे:- घरेलू हिंसा एक्ट 2005 के तहत महिलाएं अपने साथ हो रहे शारीरिक, मानसिक शोषण के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती हैं।

इसके अलावा हिन्दू अधिनियम 1995 के अनुसार, यदि कोई महिला अपने पति से परेशान है तो वह उससे तलाक ले सकती है। तो वहीं, उद्योग विवाद एक्ट की धारा 66 के अनुसार, कामकाजी महिलाओं को सुबह छह बजे से पहले और शाम सात बजे के बाद 

काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है और प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 के तहत महिलाएं प्रसव के तीन महीने बाद तक मेटरनिटी लीव पर वेतन पाने की अधिकारी हैं।

इसके अलावा अब तो पिता की सम्पत्ति में बेटी का भी उतना ही हक़ होगा जितना की बेटे का होता है। दूसरा बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए हैं।

जहां ऐसे किसी भी मामले को सुनवाई महिला जज द्वारा की जाएगी।  साथ ही किसी भी तरह की न्यायिक पूछताछ के लिए महिला को सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद पुलिस स्टेशन में नहीं रोका जा सकता है।  

बच्चियों और लड़कियों को छेड़खानी से बचाने के लिए छेड़खानी करने वाले व्यक्ति का अपराध संगीन अपराधों की श्रेणी में रखा गया है। साथ ही दहेज के लिए प्रताड़ना भी एक प्रकार का कानूनी अपराध है।

इस प्रकार उपरोक्त कानूनों का सहारा लेकर महिलाएं स्वयं को मजबूत कर सकती हैं। तथा आज के इस समाज में स्वतन्त्रतापूर्व जीवन जी सकती है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत वर्ष 1908 में हुई थी। इस दौरान अमेरिका में भारी संख्या में मजदूर महिलाओं ने एकजुट होकर समान वेतन, वोट का अधिकार, काम के समय को कम करवाने के लिए आवाज उठाई थी।

हालांकि 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मानने का चलन तब से हुआ जब इस दिन यूरोप की महिलाओं ने पीस एक्टिविस्ट का समर्थन करने के लिए रैली निकाली थी।

ऐसे में महिलाओं को उनके हक और अधिकारों के प्रति जागरूक कराने के उद्देश्य से हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।

जानकारी के लिए बता दें की इस दिवस को सबसे पहले साल 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में मनाया गया था।

इस साल 2021 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम महिला नेतृत्व : covid 19 की दुनिया में एक समान भविष्य को प्राप्त करना है। 

उपसंहार

इस प्रकार नारी आरंभ से ही अनंत गुणों की भंडार रही है। नारी हृदय में पृथ्वी जैसी क्षमता, सूर्य जैसा तेज, समुन्द्र जैसी गंभीरता, चंद्रमा जैसी शीतलता और पर्वत जैसी मानसिक उच्चता देखने को मिलती है।

वह दया, करुणा, ममता और प्रेम की पवित्र मूर्त है और समय आने पर चंडी का रूप धारण करके भी दुष्टों का नाश करती है। इसलिए आज 21वीं सदी के इस युग में नारी को किसी भी परिस्थिति में कमजोर आंकना पुरुष समाज की सबसे बड़ी भूल साबित होगा।

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