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Gm crops जीएम फसलें

जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा किसी प्रजाति विशिष्ट गुणों वाला ऐसा जीन प्रवेश करवा दिया जाए जो उस फसल में पहले से उपलब्ध नहीं था उससे फसलों में विशिष्ट गुणों का विकास किया जा सकता है तो इन्हें अनुवांशिक संवर्धित फसलें या जीएम फसलें का जाता है उदाहरण के तौर पर बीटी कॉटन ,गोल्डन राइस

इस तकनीकी का आधार आनुवंशिक अभियांत्रिकी तथा पुनर् संयोजन तकनीक है इस तकनीक के माध्यम से फसलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास किया जा सकता है उत्पादन को बढ़ाने के साथ ही साथ गुणवत्ता को भी बढ़ाया जा सकता है तथा जलापूर्ति को कम करने का प्रयास किया जाता है अर्थात कम जल में उत्पन्न होने की क्षमता उत्पन्न की जा सकती है इसके साथ ही इन्हें शीतरोधी गर्मीरोधी भी बनाया जा सकता है

विश्व में पहली बार जीएम तकनीक का प्रयोग तंबाकू पर 1982 में किया गया
जीएम फूड के रूप में पहली बार फ्लेवर सेवर टमाटर को 1994 अनुमति दी जिसके अंतर्गत  स्वाद तथा रंग को बनाए रखते हुए उसके जल्दी खराब होने की प्रवृत्ति को कम किया गया

भारत में जीएम फसलों का विकास


  • भारत में पहली बार जीएम क्रॉप्स की शुरुआत 1996 में हुई तथा 2002 में भारत की पहली अनुवांशिक समृद्धि फसल बीटी कपास थी जिसको पहली बार व्यवसायिक उपयोग की अनुमति दी गई जो गुजरात में उत्पन्न की गई थी
  • वर्तमान में भारत की कपास उत्पादन में वैश्विक भागीदारी 26% है तथा बीटी कपास को व्यवसायिक अनुमति मिलने के बाद इसके निर्यात में बढ़ोतरी हुई है यही कारण है कि भारत के कुल कपास उत्पादन में बीटी कपास का उत्पादन 95% है
  • बीटी कपास के साथ-साथ बीटी बैंगन का भी विकास किया है किंतु पर्यावरण विशेषज्ञों के विरोध के चलते 2010 में इसके उपयोग की अनुमति पर रोक लगा दी गई
  • वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के द्वारा सरसों की अनुवांशिक संबंधित फसल के रूप में डीएम डीएमएस 11 का विकास किया गया है जो सरसों की सामान्य प्रजाति वरुणा से 30 प्रतिशत अधिक उत्पादन देने में सक्षम है किंतु अभी तक इसके व्यवसायिक उपयोग की अनुमति नहीं दी गई है वर्तमान में भारत में लगभग 12 जीएम फसलों पर अनुसंधान कार्य प्रगति पर है
  • भारत में जीएम फसलों की अनुमति पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा दी जाती है इसके अंतर्गत अनुवांशिकी अभियांत्रिकी अनुशंसा समिति के द्वारा जीएम फसलों के बारे में किए गए शोध को ध्यान में रखते हुए सामाजिक व परियों ने हितों को भी ध्यान में रखा जाता है किसी भी जीएम फसल को अनुमति देनी है तो उसकी अंतिम शक्ति पर्यावरण मंत्रालय के पास है

जीएम फसलों के लाभ


  • जीएम तकनीक से की प्रतिरोधी क्षमता यानी फसलों की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है
  • जीवन तकनीकी द्वारा ऐसी फसलों का निर्माण भी किया जा सकता है जिन्हें प्रतिकूल जलवायु दिशाओं में उगाया जा सकता है
  • कुछ विशेष प्रकार की फसलें जो विशेष परिस्थितियों में होती है उनके जीन निकाल कर अन्य फसलों में प्रतिस्थापित करने से वही गुण फसलों में आ जाते हैं
  • राइजोबियम जैसे जीवाणु नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए जिम्मेदार एन आई एफ  जीन  को निकालकर दलहनी फसलों के अलावा  फसलों में प्रवेश करवाने से नाइट्रोजन उर्वरक की आवश्यकता कम हो जाएगी जिससे किसानों की लागत में कमी आएगी साथ ही साथ पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आएगी किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी तथा पर्यावरण संबंधी मुद्दे जिनका अक्सर किसान सामना करते हैं से छुटकारा मिलेगा
  • जीएम तकनीक के द्वारा देर से सड़ने वाली फसलों तथा सब्जियों तथा फलों का विकास किया जा सकता है
  • जीएम तकनीकी द्वारा विकसित फसलों की सहायता से उत्पादकता में वृद्धि संभव है साथ ही पोषण में भी सुधार होगा
  • जीएम फसलों के द्वारा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो गई जिससे आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सकती है तथा सामाजिक कल्याण पर बढ़ावा दिया जा सकता है

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